कलम चोरी

खूब पढ़ाया विद्यालय में था गया

विद्या चोरी क्या कभी होती भला

साहित्य में कुछ चोर आ जाते हैं

कवि लेखक नाम धरना चाहते हैं

गुस्सा आता इन साहित्य चोरों पर

शर्म नहीं है इनको भी क्यों तनिक

भावनाओं में खूब डूबना पड़ता है

दुख में सुख में डूबना पड़ता है

कलम यूँ ही दौड़ नहीं लगाती है

यह तो दिमांग से संकेत पाती है

जब  कलम चोरी पकड़ी जाती है

चेहरे पर उसके स्याही आ जाती है

क़ानून बने हैं साहित्य में सुनना

अपने नाम का ख्याल तुम रखना

चोरी से कोई लेखक नहीं बनता

अपने अपमान को है वह बुनता

कबीर तुलसी सूर महादेवी और

कितने ही हैं तुम्हें पढ़ने को पढ़ो

चिंतन करो लेखन अभ्यास करो

चोरी के सामान से ख्वाब न बुनो

कोई जब मेहनत से लिखता है

अपनी भावनाओं को लिखता है

चोरी के मुकुट से कोई राजा है

राजा वही जिसे प्रजा ने माना है

साहित्य चोरी में वक्त न बिगाड़ो

स्व भावनाएँ कागज पर उतारो

चुरा सकते हो लिखे शब्दों को

नहीं चुरा पाओगे तुम कला को

बन्दर घोंसले तोड़ दिया करते हैं

पक्षी कला से फिर बुना करते हैं

बन्दर कभी कला सीख न पाये

क्यों उन्हें कभी प्रयास न भाये

पूनम पाठक बदायूँ

इस्लामनगर बदायूँ उत्तर प्रदेश