बूँद एक पेट्रोल की

सब पूंजी इकट्ठा करौ, ऊर्जा मनुज लगाय।

बूंद एक पेट्रोल की, हमसे खरीद न जाय।।

इस दोहे में बाबा ठनठनलाल कहना चाहते हैं कि कोई चाहे अपनी सारी दौलत क्यों न लगा दे या फिर अपनी ऊर्जा ही। मजाल कि वह एक बूंद पेट्रोल की खरीद के दिखा सके। हमारे जीवन में पेट्रोल की महिमा अब सुनने लायक रह गयी है। इसकी खरीद तो दूर इसके दर्शन भी दुर्लभ हो गए हैं। इसलिए बच्चा! गाड़ी की मोहमाया छोड़ो। उसका त्याग करो। पैदल चलने की आदत डाल लो। हाँ अगर पैदल चलने में कष्ट होता है, तो उड़ने की कोशिश करना। भूलकर भी फटफटिए पर चढ़ने की भूल मत करना। वरना ऐसे फटोगे कि जिंदगी भर फटफटाते रहोगे।

शिष्य ढुलमुलदास ने बाबा जी के पैर पकड़े और पूछा – बाबा आपने पैदल चलने पर कष्ट होने की सूरत में उड़ने का सुझाव दिया है। यह कैसे संभव हो सकता है? कहीं आप रतन टाटा, जुकरबर्ग की तरह बड़ा सोचने की तर्ज पर अपने छोटे मुँह से बड़ी बात तो नहीं कह गए।

बाबा ठनठनलाल ने कहा, बच्चा! अभी तू बहुत कच्चा है। दुनियादारी तो छोड़ गलीदारी भी नहीं कर सकता। हम जो भी कहते हैं बहुत ठोक-बजाकर कहते हैं। हमने उडऩे की बात होशोहवास में कही है। अगर मुझ पर यकीन न हो तो जमीन पर दौड़ने वाले फटफटिया के पेट्रोल और हवा में उड़ने वाले हवाई जहाज के एविएशन टर्बाइन फ्यूल की कीमत गूगल कर डालो। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। लगता है बच्चा तेरा गूगल करना खत्म हो गया। अब बता जमीन पर दौड़ेगा या फिर हवा में उड़ेगा....?!    

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, चरवाणीः 7386578657