दीप उर्मिला का

ये फासले क्या कभी कम ना होंगे

मैं और तुम क्या कभी हम ना होंगे

दर्दे जिगर जो हद से बढ़े भी तो ,

नैना हमारे कभी नम ना होंगे।

बचपन से सीखा हमने गणित में..

सम ओ विषम मिल कभी सम ना होंगे।

भले टूट जाएं अपनों को फिर भी,

अपनी वजह से कभी गम ना होंगे।

देती है पीड़ा अपने ही हमको,

गैर में इतना कभी दम ना होंगे।

दीप उर्मिला का बन हम जलें ती..

पथ में लखन के कभी तम ना होंगे।

भुलाने को हम पिए जा रहे पर,

खारे आंसू कभी रम ना होंगे।


प्रतिभा कुमारी

त्रिवेणीगंज,सुपौल,बिहार