भीड़तंत्र

हमारे यहाँ लोग कब भीड़ बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता। चुंबकीय शक्ति के गुण विषय पर चर्चा रखिए, तब भी भीड़ आएगी। यहाँ तो अच्छे-बुरे सबके लिए भीड़ आती है। लोग भीड़ का हिस्सा हो सकते हैं, भीड़ लोगों का कतई नहीं। सच तो यह है कि देश अब भीड़ को जन्म दे रहा है। भीड़ की आबादी लोगों से कहीं अधिक है। ऊपर से मरने वाला औरत के भेष में मरद हो तो कहने ही क्या? चुटकियों में भीड़ का जमावड़ा बिछ जाएगा।

भीड़ में जवाब नहीं होते। होते हैं तो सिर्फ सवाल। उनके कमेंट्स सोशल मीडिया को मात देते नजर आते हैं।

एक कहेगा – लगता है लव फेल्यूर है।

लव करने वालों का यही अंजाम होना चाहिए – दूसरा कहेगा।

वैसा तो नहीं लगता। हो सकता है गरीबी ने इसकी जान ले ली हो। जिसके पास जहर खाने के पैसे न हो उसके लिए रेल की पटरियाँ सबसे बेस्ट होती हैं।  - तीसरे ने कहा।

लगता है परीक्षा में फेल हो गया। मरेगा नहीं तो और क्या करेगा?  - चौथे ने कहा।

हो न हो किसी को न बताने वाली बीमारी हो। - पँचवें ने कहा।

एक से बढ़कर एक कमेंट। एवरेस्ट से ऊँची हमदर्दी। उससे ज्यादा बुराइयाँ। यही भीड़ है। भीड़ का भीड़तंत्र है।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा