मेरी हसरतें

हसरत ए दीद है मुझे उस घड़ी का,

जब हमारा शम्स-ए-मुल्क़ चमकेगा।

सियासती जंग की न विसात होगी,

मंदिर मस्ज़िद एक आँगन में दमकेगा।


हसरते ए दीद है मुझे उस घड़ी का,

जब बेटियों की अस्मत न लुटी जायेंगी।

बे खौफ़ घूम सकेंगी वे इस जहाँ में,

उनकी आबरू पर आँच न आयेगी।


हसरत ए दीद है मुझे उस घड़ी का,

जब नूर ए तालीम से हर घर रौशन होगा।

ख़त्म होगी अमावस की स्याह रातें,

राह ए ज़ुल्मत में भी जुगनू होगा।

                  रीमा सिन्हा (लखनऊ)