"थोड़ी मन की सफ़ाई भी हो जाए"

नवरात्रि ख़त्म होते ही हम लग जाते है दिवाली की तैयारियों में, घर की साफ़ सफ़ाई से शुरूआत करते कपड़े, मिठाईयाँ, पटाखे और लक्ष्मी पूजन वगैरह।

माना जाता है की दिवाली के पावन दिनों में हरसू महालक्ष्मी की कृपा बरसती है, जैसे मेहमानों के आने की खबर सुनकर हम घर को साफ़ सुथरा करके व्यवस्थित करते है, वैसे ही माँ लक्ष्मी के आगमन पर दिवाली नज़दीक आते ही हम घर की साफ़ सफ़ाई में लग जाते है। हम सब मानते है की जहाँ स्वच्छता होती है वहाँ माँ लक्ष्मी का वास होता है। पर कभी ये सोचा है की चलो आज मन की सफ़ाई करते है? हमारे मन के कोने-कोने में कोरोना से भी ख़तरनाक वायरस पल रहे होते है।

समाज को और देश को खोखला करने वाले और धरती से इंसानियत को जड़ से ख़त्म करने वाले भयंकर और बर्बाद करने वाला कचरा हम अपने भीतर बड़े प्यार से गर्व के साथ पालते रहते है। 

लालच, स्वार्थ, इर्ष्या, किसीके प्रति वैमनस्य, धर्मांधता, छोटी सोच, कपट और षडयंत्र जैसे वायरसों को ख़त्म करने वाली वैक्सीन कब कोई विकसित करेगा। दिमागी कारखानों में हम पालते है इन कचरों को बड़े नाज़ों से, जो अपनेपन को, मानवता को, भाईचारे को और इंसानियत को निगल रहे है। देश में अराजकता और समाज में बैर भाव का ज़हर फैला रहे है। परिवारों को विभक्त कर रहे है।

क्यूँ कोई कभी ये नहीं सोचता कि निम्न सोच एक तरह का कचरा ही है। दिमाग से निकलकर शब्दों का रुप लेकर जुबाँ तक पहुँचते ही ये कचरा बवंडर जितने ख़तरनाक बन जाते है। हल्की सोच और ज़हरीले शब्द बहुत कुछ तहस-नहस कर सकते है। 

कुछ लोग सोच से अपाहिज होते है, वह हर छोटी बड़ी बात पर विद्रोही बन जाते है। बिना सोचे समझे जानमाल को नुकसान पहुंचाने और देश को जलाने हाथ में नफ़रत की मशाल लेकर निकल पड़ते है। परिवारों में छोटी सी बात पर अहं का वायरस दंगल खड़ा कर देता है। अपने ही दुश्मन लगने लगते है। ये सारी चीज़ें किसकी उपज है घटिया सोच वाले दिमागी कचरे की ही न।

लालच और स्वार्थ अपनों के बीच दरारें खड़ी करता है, धर्मांधता और जात-पात  देश को हिस्सों में बांटता है, कपट और षडयंत्र परिवारों को तोड़ता है। ऐसे कचरों का ढ़ेर हम भीतर लगाए बैठे होते है। ज़िंदगी बहुत छोटी है तो क्यूँ न प्यार के, भाईचारे के, अपनेपन के और सद्भाव के पुर्जों से खुद के अंदर एक वैक्यूम क्लीनर तैयार करें और इस कचरे के ढ़ेर का सफ़ाया करके खुद की, समाज की और देश की बुनियाद को मजबूत करें। नहीं लगता कि, अगर ये वैक्यूम क्लीनर बन गया तो कुदरत भी राज़ी होगी, महालक्ष्मी की कृपा बरसेगी और सभ्य और सुंदर समाज का निर्माण होगा। तो चलो प्रण ले की घर के साथ-साथ दिमाग की भी सफ़ाई करेंगे।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)