बस तेरा ख़्वाब माँगते हैं

आओ इक किताब माँगते हैं,

ग़म ए ज़िंदगी का हिसाब माँगते हैं।


हर सफ़हा पर नाम हो बस तेरा,

तुझसे मोहब्बत बेहिसाब माँगते हैं।


छोड़ गये राह-ए-ज़ुल्मत में हमें,

तेरी राहों में आफ़ताब माँगते हैं।


बेवफ़ाई का तोहमत न लगाना यारों,

जिनकी वफ़ा का हम ख़िताब माँगते हैं।


काँटे बिछाये राह में आपने मेरे,

आपकी ख़ातिर हम गुलाब माँगते हैं।


सीने में उठते हैं कई सवाल मेरे,

हम मुख़्तसर सा जवाब माँगते हैं।


नींद जब भी आये इन आँखों को,

बस तेरा ही हम ख़्वाब माँगते हैं।

               रीमा सिन्हा(लखनऊ)