"आख़िर कब बदलेगी मानसिकता"

कल एक अजीब वाकिया सुना, हमारी कामवाली की बेटी को एक हफ़्ते से बुखार आ रहा था, अस्पताल जाने की बजाय गरम कोयला नाभि के अंदर रखकर टोटका किया फिर बच्ची को अस्पताल ले जाना पड़ा। सुनकर गुस्से से खून खौल उठा और कई सारे सवाल मन में उठे की आख़िर कब लोगों की मानसिकता बदलेगी? आज जब हम इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर खड़े है, खुद को पढ़े लिखें और खुले विचारों वाले समझ रहे है तब भी सब खुद के भीतर कहीं ना कहीं कितने सारे अंधविश्वास को पाल कर बैठे है हम। 

शायद इन सारी बातों के पीछे बेबुनियाद डर छुपा होता है। इंसान चाहे कितना भी बहादुर हो हंमेशा एक भय से लिपटा रहता है और यही वजह रही होंगी इन सारे अंधविश्वासों को पोषने की।

कभी-कभी एक पीढ़ी का पाखंड दूसरी पीढ़ी के लिए परंपरा बन जाता है, आने वाली पीढ़ी को इस अंधविश्वास भरी रस्मो से परे रख सके तो बेहतर होगा।

ये किसी खास दिन खास समय पर चौराहा पार करने पर जो अटकलें होती है दर असल क्या है? चौराहे पर लोग नींबू काटकर क्यों रखते हैं?

क्या चौराहे पर रखे टोटको को ठोकर मारने वाला मुसिबत में पड़ जाता है? 

सच मानिये एसा कुछ भी नहीं होता मेरे तो कई बार अन्जाने में एसी चीज़ों पर पैर पड़े है, ज़िंदा हूँ आज भी खुश हूँ और सुखी भी।

ऐसे कई अंधविश्वास है जो की बिलकुल बचकाने है। कोई साबित करके दिखाएं की ये सब करने से अनर्थ होता है।

आप बिल्ली के रास्ता काटने पर क्यों रुक जाते हैं? जाते समय अगर कोई पीछे से टोक दे तो आप क्यों चिढ़ जाते हैं? किसी विशेष दिन को बाल कटवाने या दाढ़ी बनवाने से परहेज क्यों करते हैं?

क्या आपको लगता है कि घर या अपनी ऑफ़िस के बाहर नींबू-मिर्च लगाने से बुरी नजर से बचाव होगा? बाहर जाते समय कोई छींक दे तो आप अपना जाना रोक क्यों देते हैं? घर से बाहर निकलते वक्त अपना दायां पैर ही पहले क्यों बाहर निकालते है।

जूते-चप्पल उल्टे हो जाए तो आप मानते हैं कि किसी से लड़ाई-झगड़ा हो सकता है, रात में किसी पेड़ के नीचे क्यों नहीं सोते, रात में बैंगन, दही और खट्टे पदार्थ क्यों नहीं खाते, रात में झाडू क्यों नहीं लगाते और झाड़ू को खड़ा क्यों नहीं रखते, क्या बांस जलाने से वंश नष्ट होता है। शनिवार को लोहा, तेल, काली उड़द आदि नहीं खरीदना चाहिए। मंगलवार को नाखून काटना गलत है। शुभ प्रसंग पर काले रंग से परहेज़ या लड़की का माहवारी के दिनों में मंदिर में ना जाना।  

ऐसे तो असंख्य तर्को से जूझते है हम।

ऐसे ढ़ेरों अंधविश्वास है जिसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, मुझे तो इन सारी बातों के पिछे क्या लॉजिक है आज तक समझ में नहीं आया।

शायद ये सारी चीजें कीसी ना किसी के साथ इत्तेफ़ाक़ से हुई हो और ज़ाहिर कर दिया हो की ऐसा करने से वैसा होता है, और परंपरा गत जैसे सारी बातें होती है वैसे ये सब भी प्रस्थापित होता गया हो।

बाकी कोई ठोस या वैज्ञानिक तथ्य इन सारे अंधविश्वासों में नहीं छुपा। क्यूँ आख़िर बिना कोई तथ्य वाली बातों को दोहराते चले जा रहे है हम और सहज ज़िंदगी को अटपटी बना रहे है।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु,कर्नाटक)