मूर्ति

जयश्री अपने श्रीमान जी के साथ बाजार गयी थी, दुर्गा पूजा की पांचवी तिथि चल रही थी। बाइक से उतरकर श्रीमान जी कुछ सामान लेने दुकान में घुसे। जयश्री बाहर ही खड़ी थी, तभी पड़ोस में एक घरनुमा था, जहां दुर्गा जी की प्रतिमा को लोग अंतिम रूप देकर निखार रहे थे। एक प्यारी सी छोटी सी मूर्ति के नैनो को ब्रश से सजा रही छोटी सी बालिका ने जयश्री का मन मोह लिया।

बस तभी उनके श्रीमान जी ने बाहर आकर चलने को कहा और दोनो घर की तरफ चल दिये। घर आकर अपनी जिम्मेदारियों में दोनो व्यस्त हो गए। शादी को सात वर्ष हो गए थे, पर घर मे सूनापन ही था, एक  बच्चे की लालसा थी पर वो इच्छा अधूरी ही रही। फिर नवरात्रि की पूजा की तैयारी में दिन कैसे बीता, पता ही नही चला।

दिनभर के बाद रात को जाकर थकान मिटाने का मौका मिला, जल्द ही नींद ने आगोश में ले लिया। 

सुबह पांच बजे जयश्री आश्चर्य चकित हो उठकर बैठ गयी और श्रीमान जी ने पूछा, "क्या हुआ?"

"साक्षात दुर्गा जी मेरे सामने थी और एक कन्या का श्रृंगार कर रही थी, वो मनमोहक रूप अभी भी मेरी आँखों के सामने है।"

"सपना देखा होगा, आराम करो।"

दूसरे दिन सुबह ही काम मे लगी थी, बुरी तरह चक्कर आने लगा, श्रीमान जी को बताया तो उन्होंने अपने पड़ोसी लेडी डॉक्टर को फ़ोन कर दिया।

परिचित डॉक्टर साहिबा ने परीक्षण करके कहा, "शायद आपके यहाँ खुशखबरी आने वाली है, अस्पताल आइयेगा,  सारे टेस्ट होंगे।"

दोनो पति पत्नी आज बहुत खुश हो गए।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर