" दोहे"

लालबहादुर दिव्य थे,लालों के थे लाल ।

करके जो उन्नत गए,भारत माँ का भाल।।


संघर्षों की आग में,तपकर बने महान ।

इसीलिए हर एक से,पाया नित सम्मान।।


लालबहादुर शास्त्री,कर्मठता का रूप।

सच्चाई का पथ गहा,लगते खिलती धूप।।


लालबहादुर-सा नहीं,दिखता अब ईमान।

जो हरदम गाते रहे,राष्ट्रहितों का गान।।


‘जय जवान’ -उद्घोष से,जगा दिया यह देश।

‘जय किसान’ ने ला दिया,हलधर में आवेश।।


लालबहादुर वीर थे,सुन उनकी हुंकार।

चीन बहुत भयभीत था,झुकने था तैयार।।


पर क़ुदरत ने छीनकर,गुदड़ी का यह लाल।

हम सबको तो कर दिया,दुखी और बेहाल।।


सचमुच में वो दिव्य थे,फैलाया उजियार।

कालजयी व्यक्तित्व ने,मार दिया अँधियार।।


काया लघु पर कद बड़ा,गाया जीवन-गीत।

हर मानव के बन गए,सेवाधारी मीत।।


ऐसे नायक अब कहाँ,ना ही सच्चा भाव।

इसीलिए खलने लगा,हमको बहुत अभाव।।


                 -प्रो(डॉ)शरद नारायण खरे