विजयदशमी

विजयदशमी के पावन दिन हम 

रावण का पुतला जलाते हैं,

सच पूछो तो क्या वाकई हम

अंतः तम मिटाते हैं?

दुष्कर्म से नाक कट रही

सूर्पनखा की जगह अब सीता की,

कन्या पूजा का करते ढोंग,

लाज न बची नारी अस्मिता की।

विभीषण जैसा भाई 

अब हर घर में रहता है,

परायों को भेद बता 

अपनों से धोखा करता है।

देश के खेवनहार केवट 

चला रहे नाव बिन पतवार ,

जनता राह निहार रही

हो जाये प्रभु राम का अवतार ।

लंका दहन की भांति 

इंसान ही इंसान से जल रहे,

इक दूजे से मार काट,

द्वेष क्लेष में आगे बढ़ रहे।

रावण को जला कर क्यों

हर साल तुम शर्मिंदा करते हो?

जब हर रोज़ झूठ बोलकर

सत्य की निंदा करते हो।

आसत्य पर सत्य की

विजय का यह पर्व है ,

जीत सीता की पवित्रता 

और अंत रावण का दर्प है।

समझ के दशहरे का महत्व

दिल से इसे मनाओ,

रावण के साथ अपने अंदर

के दस मुखौटों को जलाओ।

                रीमा सिन्हा

               लखनऊ-उत्तर प्रदेश