मै जमी तू आसमां

मैं ज़मीं तू आसमां, 

औ' बस ख़ला है दरमियाँ,

इश्क़ का नामोनिशां भी 

कब बचा है दरमियाँ।

इक तरफ मेरी अदा, 

दूजी तरफ तेरी अना,

ज़ोर ज़िद का इश्क़ में 

यूँ आज़मा है दरमियाँ।

सच कभी तो देख तू 

अपनी ख़ुदी को छोड़कर,

ग़ैरवाज़िब सोच का ही 

फ़ासिला है दरमियाँ।

कैफ़ मुझको मिल रहा 

तेरे ही शग़्ले ज़िक्र में,

अब तलक भी चाहतों का 

कुछ नशा है दरमियाँ।

दूर ' रचना' है नहीं 

मंज़िल अदम की जान ले,

पार करले ज़िन्दगी तू, 

बस कज़ा है दरमियाँ।


रचना सरन,न्यू अलीपुर

कोलकाता