सब मिल बैठेंगे

तरु की झुकी हुई डालियां

पात- पात पर ओस की बूंदे

दांत किट किटाते वानर वृक्षों पर

चिड़िया मधुर चाहती हुई

धुआं सा छाया चारों ओर

फैला हुआ हर तरफ कोहरा

फटी कमीज़ पहने किसान

हल उठा चला खेत की ओर

मुंह पर पानी भी न पड़ा

धुन बस मेहनत करने की

सुबह से शाम तक है करनी

सोचने लगा महंगाई को

सुनता जाता काम संग रेडियो

माथे पर पसीना बहा जाये

पर हाथ और हल न रुक पाये

दो टूक बात की साथी से

दो पाती बोलीं काकी से

इंतजार अम्बिया चटनी रोटी का

जो भी भी उसकी लाती होगी

दोनों शाम को घर लौट आएंगे

मुन्ना मुन्नी दौड़कर भागेंगे

नहीं टॉफी चॉकलेट पूछेंगे

फिर वे सब मिल बैठेंगे

पूनम पाठक बदायूँ