नींद ना आना

आज न जाने क्यों मन फिर उन्हीं पुरानी यादों में खो चला है जिसके चलते मां मेरा मन उदास है और मुझे नींद नहीं आ रही है, सविता भरे कंठ से अपनी मां को बोली। मां सविता को समझाते हुए बोली बेटी भूल जा उस बुरी यादों को और जी फिर से एक नई जिंदगी, मेरी लाडो। सविता जो की बहुत ही होनहार थी हर काम में चाहे वो पढ़ाई हो या घर का काम, सिलाई बुनाई क्या नहीं हुनर था सविता के पास निपुण दक्ष अपने मां बाप की इकलौती संतान थी सविता उसके बाबा उसे हर एक सुख देते थे। सविता की बुलंदियों को देख उसकी ही कुछ सखियां उससे द्वेष रखती और हर पल सविता को कुछ न कुछ कर सताने की युक्ति भी बनाती पर सविता सदैव सावधान होकर एसी लड़कीयों से दूर रहने में ही अपना हित समझने लगी। एक बार द्वेष में भरी एक सखी ने अपने ही परिचित मित्र संग मिल सविता को नुक्सान पहुंचाने की योजना बनाई और बातों ही बातों में सविता से दोस्ती कर घूमने के बहाने एक सुनसान इलाके में ले गयी 

सविता उसकी करतूत से बिल्कुल अंजान थी वो दोनों बाते करती हुई बस चली जा रही थी। पहले से ही घात लगाए सविता की सखी के मित्र सविता को नजदीक आते देख जो छुप के बैठे थे, बाहर निकल सविता और उसकी सखी को घेर बैठे। सविता की सखी मन में तो द्वेष के कारण खुश थी परंतु ऊपरी तौर से भय का नाटक करने लगी और मौका देख भाग निकली सविता सखी के मित्र की शिकार हुई और जो सविता के साथ हुआ जो हमारे देश की ना जाने कितनी बच्चियों, औरतों के साथ होता है जो ताउम्र जिंदगी में एक काल जैसा ग्रहण बन ना जीने देता और ना ही मरने देता है। ना जाने कितनी सविता होंगी जिनकी रातो की नींद आंखों से ओझल हो वेदना भरी कराहना के साथ घनी अंधेरी रातों में सिसकियां भर रही होती हैं ‌। बस खत्म कर देती कभी-कभी किसी की द्वेष भावना किसी के जीवन को। 

वीना आडवानी तन्वी

नागपुर, महाराष्ट्र