गिरगिटिया दुनिया के आँसू

मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा सभ्यताएँ तो कब की विलुप्त हो गईं। अब आँसुओं की बारी है। जैसे-जैसे मानवता का सेंसेक्स ढुलक कर पाशविकता का ग्राफ आसमान को छू रहा है, वैसे में एक सच्चे अदद आँसू की बूँद की अपेक्षा करना बेईमानी नहीं तो और क्या है? वैसे आँसू निकलते कहाँ से हैं? डॉक्टरों की मानें तो आँखों से और साहित्यकारों की मानें तो दिल से। आँखें बात करती हैं। आँखें हँसती हैं। आँखें बरसती हैं। आँखें तरसती हैं। आँखें झिझकती हैं। आँखें शरमाती हैं। आँखें इतराती हैं। आँखें मुस्कुराती हैं। आँखें प्रसन्न होती हैं। यह तो मनुष्य की भावनाओं का दर्पण है। हृदय की नमी, अभिमान, क्षमा, पश्चात्ताप, आक्रोश, प्रसन्नता – ऐसे सभी संदर्भों में आँसू अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। यह उपस्थिति मानवता, सौहार्द, सहयोग, प्रेम, त्याग, अनुशासन का प्रतीक है। बदकिस्मती से अब लुप्त होते जा रहे हैं? कोरोना की लाखों मौत के बाद हृदय पत्थर बन गया है। प्रवासी मजदूरों की पैदल यात्रा हो या फिर गरीबी, भुखमरी, बदहाली, लाचारी अब किसी भी दशा में आँसू नहीं आते। अब आँसू भी बदल चुके हैं। कभी-कभी लगता है कि आँसुओं के जानदार अभिनय को नोबेल पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। अब लोग बनावटी, घड़ियाली, दिखाऊ, बिकाऊ, तात्कालीन व अस्थाई आँसू बहाने में अभ्यस्त हो गए हैं। कदाचित इन्हीं आँसुओं के चलते कई बार टूटते-बिखरते रिश्ते संभल जाते थे। अब न वैसे आँसू हैं और न वैसे लोग।

आँसू तो आँसू होते हैं। न इनका कोई धर्म होता है, न कोई जात। न ये अमीर होते हैं, न ये गरीब। इनका तो लिंग भी नहीं होता। न तो इन्हें भाषा, प्रांत के भेदों में बांधा जा सकता है और न ही शब्दों की कालकोठरी में। ये तो एकदम विशुद्ध आँसू होते हैं। फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि देश में निर्भया, दिशा, मनीषा जैसी अबलाओं की अस्मत को लूटते समय आँसू इतने भीरू कैसे बन गए? इतने डर से क्यों गए? इतने चुपचाप कैसे हो गए? यदि देश की आँखों में सच्चे आँसू होते तो वे आए दिन हो रहे बलात्कार पीडिताओं से उसके धर्म, जात-पात, प्रांत के बारे में नहीं पूछते। नहीं पूछते कि तुम्हें किस तरह से, कितने लोगों ने और कितनी देर तक अपने हवस का शिकार बनाया। अब तो आँखें सूख गयी हैं। मानो भावनाओं का अकाल पड़ा है। सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष सब अपनी-अपनी सियासी रोटियाँ सेंकने पर तुली हैं, किसी के पास पश्चात्ताप के आँसू नहीं हैं। यदि होते तो कड़े से कड़े संवैधानिक नियम बनाकर खुशी के आँसू बरसाते, यदि होते तो ऐसी घटनाओं के सुनने मात्र से आक्रोश के आँसू उमड़ पड़ते, यदि होते तो पीड़िता की आपबीती सुनकर आँसुओं से सारा बदन नहा उठता। अब तो आँसुओं पर राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक पहरेदारी है। आँसुओं को जकड़ा जा रहा है। आँसुओं में भेद किया जा रहा है। यदि कोई सच्चे हृदय से रो पड़ता है तो उसके आँसुओं को देखकर उस पर तंज कसना आरंभ कर देते हैं। रोने वाले पर नाना तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगाकर लगाकर उसे चुप कराने का प्रयास करते हैं। अब तो आँसुओं पर भी राजनीति होने लगी है। कोई इसे बिकाऊ तो कोई इसे दल-बदलु कहता है। कोई इसे नौटंकी तो कोई तमाशा कहता है।

अब लोग भावुक नहीं होशियार बनते जा रहे हैं। मानवता नहीं दानवता का गुणगान करते जा रहे हैं। जो बहुत होशियार हैं, वे दिखाऊ आँसुओं को तलवे में रखते हैं। भले आप चाहे उनका सारा शरीर ढूँढ़ ले, आँसू नहीं मिलते। अबोध उम्र की लड़कियों से बलात्कार, जालसाजी और बैंक के घोटाले होने पर, लोगों के बेरोजगार होने पर, भूख के नाम पर एक-दूसरे को काट खाने के लिए उतावले होने वाले लोगों को देखकर कभी-कभार घडियाली आँसू बहा देते हैं। ऐसे लोगों की चाहे जितनी तलाशी ले लीजिए, लेकिन आपको आँसू नहीं मिलेंगे। चूँकि ये घडियाली आँसू हैं, इनकी कीमत दिखावे के बाजार में अमूल्य है। अब सच्चाई यही है कि आँसू विलुप्त होते जा रहे हैं। बहुत जल्द इन्हें मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा की सभ्यताओं की तरह इतिहास के पन्नों में स्थान दिया जाएगा। वहाँ किया जाएगा आँसुओं का पोस्टमार्टम और बता जाएगा कि किस तरह गिरगिटिया दुनिया में मानवता की कोख से जन्मे आँसू लुप्त हो गए।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’