मुड़कर देखा

न ही कोई डायरी है

न ही कोई किताब है

बस तस्वीरों का

एक एल्बम उठाया

यूं ही एक तस्वीर पर हाथ पड़ा

जिसमें मां प्रसन्न बैठी है

गोद में प्यारी बिटिया रानी है

वह सोच रही है

बिटिया कितनी छोटी है यह

और अभी कितना वक्त लगेगा

बोलना कब सीखेगी

कब चलना यह सीखेगी

अपने छोटे-छोटे पैरों पर

इसकी अपनी एक सोच होगी

इसकी अपनी एक पहचान होगी

अभी तो मां के सिवाय

कुछ नहीं कहती

सबका मन अपनी और मोह लेती

यह तस्वीर मां के ही

तो हाथ लगी है

पीछे मुड़कर देखा तो

प्यारी बेटी खड़ी है

अब वह बड़ी हो गई है

और भला बुरा सब समझती है

बच्चे भी होते हैं पौधों की तरह

धीरे-धीरे बढ़ जाते हैं

प्यार मिलता है इनको

ये भी प्यार बांटा करते हैं

इसे देखकर कुछ कह नहीं पाती हूं

यह वही छोटी सी गुड़िया है

और फिर मैं अपने भी

बचपन में खो जाती हूं

अपना बचपन याद नहीं

अपनी बेटी से ही याद कर लेती हूं

रितु शर्मा

दिल्ली