एक-दूसरे की कविताओं में..

हम्म्म्..पता है मुझे

ये आंगन में जितनी भी धूप है

सारा का सारा सूरज नहीं है ये ,

क्योंकि ग्रसित है ये भी

ग्रहण के अभिशाप से !!


छत पर गिरने वाली बारिश

पूरा सावन कहां है ,

कि, झुलस ही जाती है

रेगिस्तानों की तपन में !!


खिड़की से झांकता हुआ चांद

वो तो पहले से ही आधा-अधूरा है ,

दिखे जो पूरा कभी

मेरी खिड़की बंद ही रहती है

अक्सर उस दिन !!


ये झिलमिलाते हुए नन्हें-नन्हें तारे

देखा है इनको भी अक्सर

टूटकर भटकते हुए !!


लेकिन

यह भी सच है

कि, कहीं न कहीं संपूर्ण हैं हम

एक-दूसरे की कविताओं में !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ