"रावण गली गली घूम रहे है"

हकीकत में आज के दौर में गली-गली रावण से भी खतरनाक मानसिकता वाले राक्षस भ्रमण कर रहे है, और हम सालों पहले जिस रावण ने सीता माता को छुआ तक नहीं उसका पुतला जलाकर रावण का दहन कर रहे है।

दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान श्री राम ने इसी दिन रावण का वध किया था और देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के बाद महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इस त्यौहार को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। दशहरे के दिन रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है।

हम रावण को समझे बिना ही परंपरागत रुप से उसका पुतला जलाने का ढ़कोसला करते है। जो लोग खुद रावण से भी गई गुज़री मानसिकता रखते है ऐसे लोग एक महान शक्तिशाली और बुद्धिजीवी रावण के पुतले को जलाकर आत्मसंतोष लेते है।  

रावण' दुनिया में इस नाम का दूसरा कोई व्यक्ति नहीं है। राम तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन रावण नहीं। रावण तो सिर्फ रावण था। राजाधिराज लंकाधिपति महाराज रावण को दशानन भी कहते हैं। कहते हैं कि रावण लंका का तमिल राजा था। सभी ग्रंथों को छोड़कर वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण महाकाव्य में रावण का सबसे 'प्रामाणिक' इतिहास मिलता है।

रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ तत्व ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे।

जैन शास्त्रों में रावण को प्रति‍-नारायण माना गया है। जैन धर्म के 64 शलाका पुरुषों में रावण की गिनती की जाती है। जैन पुराणों अनुसार महापंडित रावण आगामी चौबीसी में तीर्थंकर की सूची में भगवान महावीर की तरह चौबीसवें तीर्थंकर के रूप में मान्य होंगे। इसीलिए कुछ प्रसिद्ध प्राचीन जैन तीर्थस्थलों पर उनकी मूर्तियां भी प्रतिष्ठित हैं।

रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले जाने लगा, तो भगवान शिव ने अपने अंगूठे से तनिक-सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा करते हुए कहने लगा- 'शंकर-शंकर'- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में 'शिव तांडव स्तोत्र' कहलाया।

राम ने जब रामेश्वरम् में ‍शिवलिंग की स्थापना की थी तब विद्वान पंडित की आवश्यकता थी। रावण ने इस आमंत्रण को स्वीकारा था। दूसरी और राम-रावण के युद्ध के दौरान रावण ने लंका के ख्यात आयुर्वेदाचार्य सुषेण द्वारा अनुमति मांगे जाने पर घायल लक्ष्मण की चिकित्सा करने की अनुमति सहर्ष प्रदान की थी। इस तरह रावण की विनम्रता और अच्छाई के किस्से भी कई है।

रावण ने दो वर्ष सीता को अपने पास बंधक बनाकर रखा था, लेकिन उसने भूलवश भी सीता को छूआ तक नहीं था। हालांकि इसके पीछे उसकी प्रतिज्ञा थी।

लोग सोचते हैं, रावण ने वास्तविक सीता का हरण किया, लेकिन सच्चाई यह है कि राम को रावण के सीता हरण की योजना की जानकारी पहले हीं मिल गई थी. राम ने अग्नि देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाया था। राम ने अग्नि देव से कहा, अग्नि देव आप अपनी पुत्री सीता को अपने पास सुरक्षित रखिये। भूलोक में कुछ लीला करनी है, उसके पश्चात मैं सीता को आपके पास से ले लूँगा. उसके बाद से छाया सीता हीं राम के साथ रह रही थी. आप छाया सीता को आधुनिक शब्दों में क्लोन सीता भी कह सकते हैं. अर्थात छाया सीता का हीं रावण ने अपहरण किया था। क्योंकि सीता पतिव्रता स्त्री थी, इसलिए अगर रावण वास्तविक सीता को छू भी लेता, तो उसी क्षण वह भस्म हो जाता। 

अब परंपरा के नाम पर रावण का पुतला जलाकर पटाखों की बर्बादी करके प्रदूषण फैलाने की बजाय इंसानी दिमाग के भीतर जो रावणों वाली गंदगी पनप रही है पहले उसे साफ़ की जाए तो बेहतर होगा रावण ने सीता को छुआ तक नहीं और सदियों से जलता आ रहा है और आज के ज़माने के रावण चार महीने  की मासूम को रौंदने से भी नहीं हिचकिचाते और रावण का पुतला जलाकर रहे है, हद है। 

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)