दशहरा (विजय दशमी ) १५ अक्टूबर २०२१

                                     

“अच्छाई की जीत और बुराई की हार “

आप सभी को विजय दशमी की हार्दिक बधाइयाँ। पर रुकिए क्या हम यह पर्व मनाने के लायक हैं। क्या यह पर्व जिसे हम सदियों से रावण 

( बुराई का प्रतीक ) का पुतला जला कर मनाते चले आ रहे हैं । अब भी वैसे ही मनाना चाहिये।हाँ,क्यों नहीं , क्योंकि हम अब भी पुरातन काल की व्यवस्था में ही रहते हैं ? यदि नहीं, तो क्या हमें विजय दशमी ( रावण दहन ) मनाने का ढंग बदलना चाहिये। हाँ मेरा मानना है कि बदलना चाहिये,दशहरा मनायें अवश्य मनायें , प्रतीकात्मक रूप से मनायें ।

स्वयं को याद दिलायें की बुराई का अंत हमेशा बुरा ही होता है । 

दशहरा का स्वरूप थोड़ा सा बदलें एक तो प्रदूषण कम  होगा। दूसरे रावण दहन एक तरह से बुराई का दहन है , तो हमें  उस दिन अपने घर, परिवार और समाज से ग़लत प्रवृति को नष्ट करने का प्रण लेना चाहिए। 

पर्व के दिन एवं तदुपरान्त भी परिचर्चा के साथ कुछ सार्थक प्रयास करने चाहिए कि समाज में महिलाओं और बच्चियों के साथ जो रावण प्रवृति के लोग अमानवीय कृत्य कर रहे हैं , वह कैसे रोका जा सकता है ।

इसके लिए सभी लोग अपने अपने स्तर पर जागरूकता अभियान चलायें। 

ताकि समाज में जो इंसानी भेष में रावण रूपी भेड़िए घूम रहे हैं , उनको रोका जा सके। साथ ही यह जागरूकता हर तबके के लोग अपने परिवार में यह चर्चा अवश्य करें कि ग़लत और आपत्तिजनक व्यवहार ना करें। 

क्योंकि वह राक्षसी प्रवृति के लोग हमारे ही घरों और समाज में होंगे , पर हमें ही मालूम नहीं होगा। इसलिए महिलाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अपने बच्चों को ग़लत व्यवहार करना ग़लत है यह अवश्य समझाएँ। महिलाओं का सम्मान करना सिखाएँ। तभी समाज में महिलाओं एवं युवतियों को सुरक्षित वातावरण प्राप्त होगा ।

अन्यथा और कई सदियों तक बस रावण का पुतला ही फुंकिये। और इंसानो को अपने अंदर का रावण ले कर घूमने दीजिए। 

सही मायने में तभी रावण दहन सार्थक होगा जब समाज से रावणी सोच समाप्त होगी। एक बार अवश्य सोचें, क्या हमने समाज के, अपने अंदर के, रावण का दहन किया ?

आप सभी को पुनः बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व दशहरा (विजय दशमी) की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

लेखिका 

वंदना राज ,दोहा , क़तर