"माँ दुर्गा की आराधना का पर्व"

रिद्धि दे सिद्धि दे, अष्ट नव निद्धि दे,

वंश में वृद्धि दे बाकबानी,

ह्रदय में ज्ञान दे,चित में ध्यान दे,

अभय वरदान दे शंभूरानी,

दुःख को दूर कर,सुख भरपुर कर,

आश संपूर्ण कर दास जानी,

सज्जन सो हित दे, कुटुंब में प्रीत दे,

जंग में जीत दे माँ भवानी।

इस प्रार्थना के साथ मातारानी का आह्वान करते नवरात्रि का आरंभ होता है।

नवरात्रि यानी माँ दुर्गा की आराधना का पर्व, महिषासुर से रक्षा करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के साथ आदि शक्ति की आराधना की। उन सभी के शरीर से एक दिव्य रोशनी निकली जिसने एक बेहद खूबसूरत अप्सरा के रूप में देवी दुर्गा का रूप धारण कर लिया। नौ दिन तक चले युद्ध में दसवें दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर का अंत कर दिया तभी से ये नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।

साल भर की चारों नवरात्रियों में चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व होता है। शारदीय नवरात्रि में लोग पंडाल बनाकर मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करते हैं और उनकी 9 दिनों तक पूजा आराधना करते है। हिंदू नववर्ष की शुरुआत चैत्र नवरात्रि से मानी जाती है, वहीं शारदीय नवरात्रि धर्म की अधर्म पर और सत्य की असत्य पर जीत का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि साल में इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर अपने मायके आती है।

हिन्दू धर्म में मां की आराधना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती ये तीन रूप में करते हैं। हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है "या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयते" यानी "सभी जीव जंतुओं में चेतना के रूप में ही माँ देवी तुम स्थित हो"

गुजरात में नवरात्र पर्व के दौरान नौ दिनों तक हर तरफ गरबा और गरबा की धूम होती है। यह गुजरात का पारंपरिक लोक नृत्य है, जिसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पर अब तो लगभग पूरे देश में गरबा प्रचलित हो गया है। पर अब लगता है धार्मिक महत्व को परे रखकर दांडिया मौज-मस्ती करने का ज़रिया बन गया है। 

नवरात्री की पहली रात्रि को कच्चे मिट्टी के छेदयुक्त घड़े, जिसे 'गरबो' कहते है।

इसकी स्थापना होती है। फिर उसके अंदर दीपक जलाया जाता है। इस दीपक को ज्ञान की रोशनी का प्रतीक माना जाता है।

नवरात्रों में 51 शक्तिपीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्तिपीठों पर नहीं पहुंच पाते, वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं। शास्त्रों के मुताबिक, हमारी चेतना के अंदर तीन प्रकार के गन व्याप्त हैं। इनमें सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण है। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है। नवरात्रि के 9 दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व माना जाता है।

नवमी तिथि पर माता सिद्धिदात्री के पूजन के साथ कन्या भोज कराने के बाद नवरात्रि के व्रत का समापन किया जाता है। नवमी तिथि पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इन कन्याओं या कंजकों को माता दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है।

आमंत्रित की गई कन्याओं और बालक के घर पर पधारने पर सर्वप्रथम शुद्ध जल से उनके पैर धोए जाते है। इसके बाद कन्याओं को आसन पर बिठाकर सभी का कुमकुम और अक्षत से तिलक करते है और बाद में मातारानी को भोग लगाकर बालिकाओं को भोजन कराया जाता है। सभी बालिकाओं को भोजन कराने के पश्चात उनके पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते है, इसके बाद सभी को फल भेंट करें और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर विदा देते है, तब जाकर नवरात्री व्रत का समापन होता है।

जो भक्त सच्चे हृदय और भक्तिभाव से आराधना करते हैं मां दुर्गा उनके सारे कष्ट हर लेती हैं और उन्हें सुख-शांति एवं समृद्धि प्राप्त होती है।

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु,कर्नाटक)