गौरैया

घर के छज्जे में बना घोंसला,एक गौरैया रहती थी। छोटे-छोटे बच्चों के संग,नित नए स्वप्न वह बुनती थी।। ,फुदक फुदक कर मेरे सामने हर दिन आया करती थी।शायद अपनी भाषा में हमसे आकर कुछ कहती थी। मैं भी बिखरा देता था,मुट्ठी भर  चावल के दाने,दाने चुंगती और उड़ जाती, बच्चे भी हो गए सयाने।।

अब अपने बच्चों को भी, वह साथ लिए आती थी। दाने चुनकर फ़ुर्र हो जाना बच्चों को सिखलाती थी।। और बताती थी बच्चों को  आबो हवा जंगल की।। कैसे जंगल में जीना है किस्सा सब मंगल की।।तरह तरह के रूप पकड़ कर रोज बहेलिया घूम रहे हैं। अपने स्वार्थ की सिद्धि हेतु, मंदिर में देव पग चूम रहे हैं।।जीना‌ है तो जीवन में ,पग-पग पर होशियारी सीखो।जाल में खुद फंसने से पहले,बचने की तैयारी सीखो।।

गौरीशंकर पाण्डेय सरस