ब्रिटेन में महंगाई की मार चरम, हर परिवार पर 1.80 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ

लंदन। कोरोनाकाल में भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के बड़े देश भी महंगाई की मार से बेहाल हैं।  वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आई बाधाओं, श्रमिकों की कमी और ईंधन की बढ़ती कीमतों के चलते ब्रिटेन में महंगाई की मार चरम पर पहुंच गई है। सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च (सीईबीआर) के हालिया अध्ययन में साल के अंत तक देश में चार लोगों के परिवार पर 1800 पाउंड (लगभग 1.80 लाख रुपये) का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अनुमान जताया गया है।

वहीं, सेवानिवृत्त जोड़ों की बात करें तो यह आंकड़ा 1100 पाउंड (करीब 1.10 लाख रुपये), जबकि कम आय वाले दंपत्ति के मामले में 900 पाउंड (लगभग 90 हजार रुपये) आंका गया है। इससे पहले, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने आशंका जताई थी कि 2021 के अंत तक ब्रिटेन में महंगाई दर चार फीसदी के करीब पहुंच जाएगी। वहीं, सुपरमार्केट शृंखलाओं ने खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कम से कम पांच प्रतिशत का इजाफा होने का अंदेशा जाहिर किया है।

ब्रिटेन में ईंधन की दरों में भी जबरदस्त वृद्धि देखने को मिल रही है। एक अनुमान के मुताबिक डेढ़ करोड़ से अधिक परिवारों को सालाना 140 पाउंड (लगभग 14 हजार रुपये) अतिरिक्त बिजली का बिल चुकाना पड़ रहा है। वहीं, पेट्रोल का दाम सितंबर 2013 के बाद के उच्चतम स्तर यानी 136.10 पाउंड प्रति लीटर पर पहुंच गया है।

सीईबीआर के अध्ययन में ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई दर के लिए ब्रेग्जिट और कोविड की दोहरी मार को कसूरवार ठहराया गया है। इससे देश में श्रमबल का गहरा संकट भी खड़ा होने लगा है। सेब और नाशपाति के बागानों में 15 से 20 फीसदी कम श्रमिक काम पर पहुंच रहे हैं।

ट्रांसपोर्ट सहित कई अन्य क्षेत्रों में तो श्रमिकों की संख्या में 30 से 40 फीसदी तक की गिरावट देखी जा रही है। इससे आपूर्ति शृंखला का बाधित होना और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल आना लाजिमी है। प्रशिक्षित श्रमबल की कमी दूर करने के लिए देश में हुनरमंद प्रवासी कर्मचारियों को बुलाने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है।