पितृ भोज

तर्पण का आज अंतिम तिथी को पिंड दान और पितृ भोज और ब्राह्मण भोजन, दान दक्षिणा का समापन कार्य था। सुबह से ही समापन कार्य अनुष्ठान की तैयारियां चल रही थी जिससे घर में काफी चहल पहल थी।

मेरा बेटा बेटी बहुत संस्कारी और सारे रीति रिवाज को बखूबी प्यार और आस्था से निभाता था। कहीं कोई अंदेशा हो तो दादा से प्रश्न पूछ कर शंकाओं का निवारण कर लेता।

दादाजी ! पिंड दान और पितृ भोज और ब्राह्मण भोजन दोपहर को ही क्यों किया जाता है?

पोते के सिर पर हाथ फेरते हुए बेटे! चूंकि शास्त्रों में सुबह और शाम देव कार्य के लिए बताया गया है। और दोपहर पितरों के लिए। इसलिए तो कहते हैं दोपहर को पूजा नहीं करना चाहिए। दरअसल पितर मृतलोक और देवलोक के मध्य लोक में निवास करते हैं। जो चंद्रमा के ऊपर बताया गया है 

दूसरी वजह यह भी है कि दोपहर से पहले सूर्य  की रोशनी पूर्व दिशा से आती है जो देवलोक की दिशा मानी जाती है।

दोपहर में सूर्य मध्य में होता है जिससे पितरों को सूर्य के माध्यम से उनको उनका अंश प्राप्त हो जाता है।

तीसरी मान्यता यह है की दोपहर से सूर्य अस्त की ओर बढ़ना शुरु होता है और इसकी किरणें निस्तेज होकर पश्चिम की ओर हो जाती है, जिससे पितृ गण अपने निमित्त दिए गए पिंड, पूजन और भोजन को ग्रहण कर लेते हैं।

दादाजी ! आपने सफेद फूल ही क्यूं कहा लाने। पता है कितना  मुश्किल से मिला है लोगों के घर जाकर मांगना पड़ा घर में तो इतने सारे लाल पीले सफेद फूल हैं?

बेटे ! फूल कम पड़ रहे थे इसलिए कहा। फिर सफेद फूलों से ही पितर की पूजा होती है। क्यूंकि सफेद सात्विकता का प्रतिक है। आत्मा का कोई रंग नहीं होता। वहां की दुनियां रंगविहीन पारदर्शी होती है । इसलिए पितरों की पूजा में सफेद रंग का ही प्रयोग होता है दूसरी वजह सफेद रंग का चंद्रमा से संबंध है जो पितरों को उनका अंश सीधा पहुंचता हैं।

दादाजी ! पितृ पक्ष के तिथी में ही क्यूं भोजन कराते हैं और दिन कभी भी तो करा सकते हैं न? इसी दिन क्यूं?

चुप कर कितना प्रश्न पूछता है चल जा  थोड़ी पढाई कर ले। बहन कहती है।

पिता हंसते हुए कहते हैं मैं बताता हूं बेटा ! जिस तिथि को डेथ होता है, उसी तिथी में उसका श्राद्ध करना चाहिए।

जिनको तिथी मालूम ना हो वो क्या करेंगे?

जिन्हें पता ना हो उन्हें अमावस्या को करना चाहिए। श्राद्ध  डेथ वाली तिथी को ही किया जाता है। डेथ तिथि को ही पितर को अपने परिवार द्वारा दिए गए अन्न जल की अनुमति है।

चलिए अब बहुत हुआ पंडितजी आ गए... विधिवत पिंड दान पूजन संपन्न होने के बाद पंडित जी ने सारी पिंड पूजन सामग्री पहले गंगा में प्रवाहित करने कहा।

गंगा किनारे मुझे एक अजीब सी अनुभूति हुई... हुआ ये की जब मैं पूजन सामग्री प्रवाहित कर स्नान करके जब ऊपर आकर घर जाने लगा तो मुझे ऐसा लगा किसी ने मुझे आवाज़ दी रुको। 

जब पलटकर देखा तो ऊपर कोई नहीं था एक दो जो थे वो स्नान कर रहे थे मैं सोच रहा था कि किसने आवाज़ दी.. ऐसा लगा मां पुकारी हो। आवाज बिल्कुल उनके जैसी थी।

तभी एक काग ने कांव कांव किया जो पास ही सीढ़ी किनारे बने रेलिंग पर बैठा मुझे ही निहार रहा था ।तभी एक और काग आकार उसके पीछे बैठ गया ।अब दोनों मुझे निहारने लगा। 

मैं सोचने लगा कि क्या ये मेरी मां के रूप में आई है और आवाज़ दी है क्योंकि मैं मां के अंतिम समय में उनके पास नहीं था। तभी पीछे बैठे काग ने कांव कांव करके जैसे कुछ पूछ रहा हो पहले वाले ने भी अपनी बोली में कुछ कहा।

शायद ये की हमें कैसे पहचानेगा ..हमारी बोली भी तो नहीं समझता शायद हमारे बारे में ही सोच रहा है और मेरी ओर निहारने लगे। फिर दोनों एक दूसरे को देखा और उड़ कर मेरे चारों ओर दो चार चक्कर लगा कर दूर उड़ गए।

मैं मां पत्नी के बारे में सोचता घर आकर पितरों के लिए भोजन आंगन में जैसे रखा बहुत सारे काग आकार भोजन ग्रहण करने लगे।

ब्राह्मण भोजन कराकर दान दक्षिणा देकर विदा किया फिर गाय और कुत्ते को भी भोजन कराने का महत्व है तो उन्हे भोजन देकर हम सबने भोजन किया।

मैं अपने पिता को गंगा किनारे का प्रसंग सुनाया तो पिताजी ने कहा बेटा ये तो बहुत ही खुशी की बात है की वो तुम्हें आशीर्वाद देने आए थे । 

देखो आंगन में अभी भी कैसे सब पूर्वज पितर खुश होकर साथ में भोजन ग्रहण कर रहे हैं ये हमारा सौभाग्य है कि सारे पितर का आशीर्वाद तुम्हें मिल रहा है।

स्वरचित ✍️

रीता मिश्रा तिवारी