वो दिन जब हम तितली के पीछे भागते थे

मानव मन के गहन गह्वर में अनुभूतियों का सागर है,

मस्तिष्क पटल चुनकर लाता है यादों के रक्तमणि,

सुनहरे स्वप्निल बचपन की भरी पड़ी जहाँ गागर है।


याद आते हैं वो दिन जब हम तितली के पीछे भागते थे,

रंग-बिरंगी तितलियों को पकड़ कर खुश होते,

बाग बगीचों में खेलना, हाथ किसी के न आते थे।


प्यारी तितलियों को देख मन पुलकित हो जाता था,

फूलों का पीकर मकरंद उड़ती जब वो स्वछंद,

अपना मन भी उड़ता और नीलगगन में खो जाता था।


सच,वो दिन बड़े सुहाने थे,हर दुःख से अनजाने थे,

बस थी अपनी इक अलग सपनों की दुनियां,

परियों के किस्से लगते बड़े लुभावने थे।


छूट गया बचपन,छूट गये प्यारे मतवाले वो दिन,

ज़िम्मेदारियों के बीच दब गयी निश्छल हँसी,

जाने कहाँ गये वो दोस्त,रह ना पाते थे हम जिनके बिन।


                       रीमा सिन्हा (लखनऊ)