बेड़ियाँ

"आज लता स्कूल नही जाएगी,कह देना उसे.।"

"क्यूं लता के बापू..?"

"उसके इम्तेहान होने वाले है और कितना मेहनत कर रही है वो ,फिर भी आपऽऽऽऽ...!"

"कह दिया न बस!,लड़के वाले देखने आ रहे है ।"

"आजकल कौन किसके काम आता है ।बड़ी कृपा है, श्यामलाल की जो हमें घर बैठे रिश्ता बता दिया।"

अब तुम भी मेहमानों की तैयारी मे लग जाओ।यही आठ से दस लोग होंगे।

"लताऽऽऽ....!हाँ माँ क्या बात है बोलो.?"

अपने स्कूल के लिए तैयार होकर निकलती लता को टोका...

"आज स्कूल नही जाना ,तेरे बापू ने कहा है।"

"पर क्यूँ..?"

"वोऽऽऽ,तुझे देखने लड़के वाले आ रहे है।"

"चल ये अपने जूते खोल और पहनने को कपड़े रखे है ,वही पहनना।"

ले ये पायल और चुड़ियाँ है ..

मेरी आजादी अच्छी नही लग रही है न...

मेहमानों के आगे सजी धजी लता बूत बन कर बैठी हाँ और ना के जबाव के बीच ठहरी थी।

"आगे क्या इरादा है तुम्हारा ?,"मेहमानों मे से किसी एक के सवाल पर चौंक पड़ी थी।

"इरादा तो मेरा अपने पैरों पर खड़े होने की है।

तभी मै विवाह करुँगी।"

लता के जबाव से उसके पिता खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए देख रहे थे।

ये क्या कह रही हो ...?

"माफ करियेगा आपलोग ,अभी यह बच्ची ही है समझ नहीं कहाँ क्या बोलना है।"

उसने सही ही कहा है,हम सब गुनाहगार है अगर किसी के सपनों को बेड़ियों में जकड़ते है।

हमसब की तो यही राय है ,अपनी बेटी के सपनों को उड़ान भरने दे।


स्वरचित

सपना चन्द्रा

कहलगाँव भागलपुर बिहार