कागज कलम दवात

कागज कलम दवात को

मैं अपने हाथों में ले

बैठ जाती हूँ, एक तरफ

अपने मन में कुछ ख्याल लिए

जो भी आए है मेरे मन में

उसको उतार देती हूँ पन्नों पर

कुछ को मेरे भाते ख्याल

जिसे ना हों पसंद वो पल्ट के पन्ने

अब दुनियाँ का डर नहीं लगता

बहुत ही कम जो मुझको ठगता

क्योंकि अब मैं सुनूँ बहुत कम बातें

जो भुला ना पाऊँ मैं दिन- रातें

बस मेरी कलम मेरी पूजा बन गई

ये मेरी सच्ची सहेली बन गई

अब इस कागज, कलम बिन मैं चैन

पाऊँ ना, रचनाएँ लिखे बिना

मैं अब जी पाऊँ ना l


करमजीत कौर, शहर - मलोट, जिला श्री मुक्तसर साहिब, पंजाब