थोड़ा-थोड़ा तुम मुझमें ही रह गये

जाते जाते मूक अधरों से तुम कुछ गये,

ज़्यादा नहीं थोड़ा-थोड़ा तुम मुझमें ही रह गये।

मधु दिन की स्वर्णिम यादों से किनारा तुम कर गये,

ज़्यादा नहीं थोड़ा-थोड़ा तुम मुझमें ही रह गये।


विस्तृत नभ में ढूंढा मैंने भी खुशियों का इक कोना,

तेरी यादों से विलग मुझे हर हाल में था होना।

उस कोने के विटप वन में पावस बन तुम ठहर गये,

ज़्यादा नहीं थोड़ा-थोड़ा तुम मुझमें ही रह गये...


अधिकार न मैंने दिया और न तुमने मांगा कभी,

अदृश्य डोर के बंधन में बँध गये थे दो अजनबी।

चिर स्थायी शैल से प्रपात बनकर तुम बह गये,

ज़्यादा नहीं थोड़ा-थोड़ा तुम मुझमें ही रह गये...


यूँ तो न कोई तस्वीर तुम्हारी,न कोई निशानी,

है बस चंद पलों की अनछुई सी कहानी।

लघु मिथक श्वासों में स्पंद उर्मि तुम भर गये,

ज़्यादा नहीं थोड़ा थोड़ा तुम मुझमें ही रह गये...


                 रीमा सिन्हा (लखनऊ)