शिल्पी हूँ

बाँची पोथियाँ हैं खूब भली

और ज्ञान का पाठ पढ़ाया भी

निर्मल,निश्चल तू श्वेत मिला

अक्षर रंग से नहलाया भी,

पृथु की पृथ्वी और अंतरिक्ष

सारे अभेद्य भेदे तूने

नक्षत्रों तक भर ली उड़ान

सागर के चीरे हैं सीने,

सब दिया समाहित मैं जिसमें

अक्षय आशीष और अमिट ज्ञान

समता,समदर्शन सिखलाया

कोई अहम नहीं,कोई भेद-भान।

किंतु, यह प्रश्न निरुत्तर है

रोपण सम विद्या, सम ही धान

क्यों उगता है एक दुर्योधन

दूजा उगता अर्जुन महान।

ब्रह्मांड के परम विधाता ने

त्रिदेव-त्रिशक्ति भरी मुझ में

शिल्पी हूँ देता क्षमादान

कर्तव्य के पथ का पोषक हूँ,

मैं बना देव गुरु बृहस्पति,

संग असुर समीक्षक शुक्राचार्य,

चाणक्य का तीव्र ललाट भी हूँ,

किन्तु असहाय सा द्रोणाचार्य।

भिक्षक बन शिक्षक घूम रहा

कब मौर्य मिले कोई महान

कलुषित कुरु राजनीति त्यागो

निर्माण करो एकलव्य महान।

निर्माण करो एकलव्य महान।


महिमा तिवारी,वरिष्ठ कवयित्री व शिक्षिका 

प्रा0वि0-पोखरभीन्डा नवीन,

रामपुर कारखाना,देवरिया-उ0प्र0