जिऊतिया

“जजमानी! आपकी बहु ऊँघ रही हैं। समझाइए कि चील्ह-सियार और जीमूतवाहन की कथा ध्यान से सुनें, तभी इस महाव्रत का पुण्य मिलेगा”, कथा सुनाते हुए पंडित जी नाराज स्वर में बोले।

“नाराज न हों पंडित जी! ड्यूटी से लौटी है, थकी होगी।”

रिया सजग होकर पंडित जी की ओर मुखातिब हुई, “इससे जुड़ी प्राचीन कथा सुनाइए न पंडित जी! तब सारे दिलचस्पी लेंगे।”

“व्रत में यही कथा सुनाई जाती है। पर मैं आपको महाभारत से जुड़ी कथा सुनाता हूँ, सुनिए!”

महाभारत के संग्राम के दौरान अर्जुन की अनुपस्थिति में द्रोणाचार्य के बनाए चक्रव्यूह में अकेले अभिमन्यु ही  प्रवेश कर पाए। अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया पर कौरव पक्ष के महारथियों ने एक साथ मिलकर अन्यायपूर्वक अभिमन्यु का वध कर दिया। उत्तरा उस समय गर्भवती थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें पति के साथ सती होने से रोका।

युद्ध की समाप्ति पर अश्वत्थामा अपने पिता की मृत्यु के प्रतिशोध में एक रात पांडवों के शिविर में घुस सोते हुए पाँच लोगों को पांडव समझ कर खत्म कर दिया तथा शिविर में आग लगाकर भाग गया। पर वे पांडव नहीं बल्कि उनके पुत्र थे। अर्जुन ने उसे पकड़ कर द्रौपदी के सम्मुख उपस्थित किया पर मृत्युदंड के बदले उससे उसकी मणि छीन कर द्रौपदी ने उसे मुक्त करवा दिया। उसने कृतज्ञ होने के बदले पांडवों का वंश निर्मूल करने के लिए ब्रह्मशिर अस्त्र चला दिया, जिसे ब्रह्मास्त्र के समान ही शक्तिशाली, अचूक और घातक कहा गया है। पांडव श्री कृष्ण की कृपा से बच गए तो अश्वत्थामा ने उसकी दिशा उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दी। उत्तरा की करुण पुकार सुन कर श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप से उनके गर्भ में प्रवेश करके पांडवों के एक मात्र वंशधर की रक्षा की किंतु जन्म के समय बालक मृत पैदा हुआ।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने सूतिकागृह में प्रवेश किया। सुध-बुध खो चुकी, श्री कृष्ण पर अथाह विश्वास रखने वाली उत्तरा मृत बालक को गोद में उठाकर कहने लगी, ‘‘बेटा! त्रिभुवन के स्वामी तुम्हारे सामने खड़े हैं। तू धर्मात्मा तथा शीलवान पिता का पुत्र है। अशिष्टता अच्छी नहीं। सर्वेश्वर को प्रणाम कर। सोचा था कि तुझे गोद में लेकर इन सर्वाधार के चरणों में मस्तक रखूँगी, पर मेरी सारी आशाएँ नष्ट हो गईं।’’

भक्तवत्सल भगवान  ने मृत बालक पर जल छिड़क कर अपने योग बल से उसे जीवित कर दिया। उसकी साँस चलने लगी। चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गई। पांडवों का यही वंशधर, जो कुरु वंश के परिक्षीण होने पर पैदा हुआ था, आगे चलकर राजा परीक्षित कहलाआ।

श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के बच्चे को पुनर्जीवित करने की कथा के कारण व्रत का नाम जीवित्पुत्रिका व्रत पड़ा, जो संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य की कामना के लिए किया जाता है। जिस तरह भगवान ने पांडवों के वंश को विनष्ट होने से बचाया, उसी तरह सब पर कृपा करें।

“बड़ी अच्छी कथा सुनाई आपने, पंडित जी!’

पंडित जी मुस्कराए और चपल बहुरानी वहाँ से चंपत हो गईं।

#नीना_सिन्हा/पटना।