माँ मुझे जाने दो न


माँ मुझे जाने दो ना ,

बस अब और नहीं रोना तुम,
इस जहाँ से विदा हो जाने दो ना।
माँ, तुम मत घबराना ,
मैं फिर से बिटिया बन आऊँगी,
इस बार शायद रिश्तों का ,
सही आकलन मैं कर पाऊँगी।
तूने गलत बताया था माँ,
पड़ोस के काका को भी
अपना बताया था माँ।
माँ, मैं टॉफी लेने ही तो गयी थी,
फ्रॉक और गुँथी चोटियाँ मेरी,
मैं नन्हीं सी कली थी।
क्या हुआ  फिर कुछ याद नहीं,
खून से लथपथ मैं चिल्लाई ,
सुन ले कोई  फरियाद कहीं।
कोई भी ना आया था माँ,
कुछ क्षण बाद मृत शरीर को मेरे,
तूने गोद उठाया था माँ।
माँ, तुम बिन रहना कठिन होगा,
मैं अच्छे से रह भी लूँ तो,
तुझे ना कभी यकीन होगा।
तेरे हाथ का खाना याद आयेगा माँ,
कौन लोरी गाकर वहाँ
मुझे सुलायेगा माँ।
विश्वास करो मैं फिर आऊँगी,
बस अब और नहीं सीता बनूँगी,
रणचंडी बन  संहार करूँगी।
स्त्री का कोई न अपना है माँ,
निज लड़ाई खुद ही लड़नी होगी,
पुरुष दें सम्मान हमें ये सपना है माँ। 
                 रीमा सिन्हा(लखनऊ)