॥ चाँद का दीदार ॥

अय चाँद जरा ठहर जाओ

जी भर दीदार कर लूँ इनका

ये पल फिर आये या ना आये

बाँहों में जरा भर लूँ इनको


खुशबू हवा में केवड़ा का

यूँ ले रही है अँगड़ाई कहीं

फिजां में इनकी बदन की खुशबू

महका रही है गुलशन को कहीं


चातक तेरे नूर का भूखा है

कब से निगाहें तेरी ओर कर बैठा है

पागल प्रेमी इस वन उपवन में

मोहब्बत में दिल लगा बैठा है


उस पार जरा बदली को भेजो

तेरे चेहरे पे चादर ना ढँक पाये

चाँदनी में खिली इस उपवन को

जुल्फों के साये में ना छुपा पाये


चलो गुफ्तगूँ कर लूँ कुछ पल बैठ कर

ना जाने जमाना कब दीवार बन जाये

बाँहों में एक दूजे का समां कर

शिकवा व शिकायत दूर कर लें ।


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार