"देश को ही अपना परिवार समझो"

अपनों के ख़िलाफ़ रचकर षड्यंत्र

अपनों से ही क्यूँ बैर रखते हो 

मिलाकर नफ़रतों का ज़हर 

बादलों में क्यूँ अमन की बूंदों का 

इंतज़ार करते हो

भरते हो रंग इर्ष्या का बयारों में 

और शांति की कामना करते हो

धरा के उर पर खून की 

बौछार करते हो कहाँ से उगे 

भाईचारे के धवल फूल

सियासत को जंग का नाम देते हो 

पैदा कहाँ होगा गाँधी सा नेता 

भ्रष्टाचार की अलख जगाकर

देश को लूटने का काम करते हो

राम भूमि पर जन्म लेकर मानव

क्यूँ नीयत रावण सी रखते हो

बांटकर धर्म को रंगों की स्याही से

सेक्युलर होने का नाटक करते हो

इंसान हो तो इंसान ही बने रहो

क्यूँ राक्षसों वाली हरकत करते हो

सुकून चाहती है अब धरा भारत की

भारतीय संस्कृति को भारतीय 

बनकर ही बदनाम करते हो।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु) #भावु