उम्मीदों के मेले

सफर शुरू होता है, 

काफिला ये चलता है, 

खूबसूरत इन नजारों में, 

लगने लगते हैं फिर, 

उम्मीदों के मेले। 


उम्मीदों के मेले में, 

दुकानें चाहतों की, 

जागते हैं ख्वाब फिर, 

चाह होती पाने की। 


चाह जागे तो, 

फिर कदम उठते हैं, 

तब होश कुछ न रहे, 

हम निकल पड़ते हैं। 


चाह जागे अगर, 

और ख्वाब हो सजे तो, 

उड़ान भरने को, 

यह पंख खुलते हैं। 


मन को ना बंद कर, 

अंधेरे से कमरे में, 

चल मन तैयार हो, 

चले उम्मीदों के मेले में। 


चल मन इस बार फिर, 

उम्मीदों के मेले में, 

ख्वाब मिल जाए अगर, 

शायद कोई दुकान में। 


स्वरचित- अनामिका मिश्रा 

झारखंड, सरायकेला (जमशेदपुर)