शिक्षा

रीमा के पांच वर्षीय बेटे ने स्कूल से आकर कहा, "मम्मा, कल शिक्षक दिवस है, मुझे क्लास टीचर के लिए उपहार ले जाना है, एक दूसरे कक्षा की शिक्षिका ने आकर हमे धीरे से कहा है।"

रीमा सोच में पड़ गयी, शिक्षक, जो देश का भविष्य सुधारक होते हैं, आज वो किस स्तर पर हैं, उपहार देना क्यों जरूरी हो गया है। हम जब स्कूल जाते थे, हम जयंती मनाते थे, शिक्षक दिवस, दोहे, कविता बोलकर मनाते थे।

रीमा के पापा सरकारी स्कूल के सीनियर शिक्षक थे, उन्हें तो उस समय कोई उपहार नही मिलता था। जी तोड़ मेहनत विद्यार्थियों के साथ करते थे, जो कमजोर होता था, उसे घर बुलाकर हर पाठ समझाते थे। तब पूरे शहर में लोग उन्हें मास्टरजी का सम्मान देते थे। उनके कई विद्यार्थी सम्मानित जॉब में लग गए थे, जब भी उनके शहर आते थे, मिठाई अवश्य लाते थे, वो शिक्षक के प्रति आदर और प्रेम था। आज रीमा विचारों में खोई थी, जो आजीवन साइकिल से चले लेकिन हज़ारों जीवन उन्होंने कारों में चलने लायक बनाये। 

आज भौतिकवादी युग मे शिक्षा किस ओर जा रही है।


स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर