---------साधु,संत और महंत -------

अनिल त्रिपाठी 

यह कोई नई घटना नहीं है !

नरेंद्र गिरी बड़े पद पर थे तो पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई !

संतों की अकूत संपदा ही उनकी बर्बादी का सबब बन गई !

इस संत जगत को जो करीब से जानते हैं , उन्हें पता है कि ज्ञानमार्ग के ये पथिक कितने अकेले हैं !

क्यौं हैं इसका कारण वे भी जानते हैं और समाज भी !

लेकिन समाज पर भक्ति का ऐसा आवरण चढ़ा है कि लोग विराट आश्रमों और मठों के भीतर बसे अंधेरे को देखना ही नहीं चाहते !

नरेंद्र गिरी सोसाइड नोट छोड़ गए हैं और काफी कुछ साफ कर गए हैं !

पर सवाल हैं कि उठेंगे और उठते रहेंगे !

सच कहें तो सवालों का उठना 60 के दशक में शुरू हो गया था । यह वह दौर था जब ओशो जैसे अनेक संतों ने भारत की गरीब और पीड़ित जनता को ज्ञान बांटने के बजाय पश्चिम की समृद्धि को ज्ञान देने के लिए चुना था । ओशो हों , बाल योगेश्वर या महेश योगी ; योरोप और अमेरिका जाने के पीछे उनके मन में भारी दौलत कमाने की लालसा थी । तब की संतई को लगा कि लोभ मोह और त्याग का संदेश भारत के गरीब समाज को देने से उन्हें कुछ नहीं मिलेगा । संत बनने के लिए जिस आसक्ति को त्यागना जरूरी है , उसी आसक्ति ने लोभ बनकर संतई के भीतर प्रवेश कर लिया ।

बाकी काम आपातकाल ने पूरा कर दिया । यद्यपि तब तक हिप्पियों के रूप में पश्चिम से ऊबे लोगों का भारत आना शुरू हो चुका था । हिप्पियों के साथ भारी मात्रा में डॉलर और पौंड भी भगवा जगत के आश्रमों में पहुंचने लगे । आपातकाल लगा तो अपना काला धन छिपाने के लिए देश के बड़े बड़े धन्ना सेठों ने संतों के मठों और आश्रमों में दान किया , आयकर धारा 80 जी का लाभ उठाया । नतीजा यह निकला कि भारत के तीर्थों पर कुटियाओं की जगह गगनचुंबी अट्टालिकाओं ने लेनी शुरू कर दी । आश्रमों में चमचमाती विदेशी गाड़ियाँ आ गई । संतों ने भगवा की आड़ में वही सारा सुख पाना शुरू कर दिया , जिसे छोड़कर वे विरक्ति के मार्ग पर चले थे ।

देखते ही देखते देश की शीर्ष राजनीति संतई की गुलाम बन गई । संतों को ताकत , सत्ता और दौलत का ऐसा चस्का लगा कि ऋषि मुनियों की सारी मीमांसा ही जाती रही । संतों के आश्रम सत्ता पाने का माध्यम बनते चले गए । संतों ने अपनी दौलत अपने उस परिवार से बांटनी शुरू कर दी , जिसे छोड़कर वे संन्यस्थ हुए थे । फिर क्या था , संतई के सारे मतलब ही बदल गए । संत सीधे राजनीति में आ गए ।

 वे सांसद , विधायक और मुख्यमंत्री तक बनने लगे । समाज को कुछ देने की बजाय समाज से लेने की होड़ ने संतजगत को हास्यास्पद बना डाला । उनमें गौतम , कणाद और भास्कर नहीं , रामरहीम , राधे माँ ,  आसाराम बापू और रामपाल पैदा होने लगे । वैदिक ऋचाओं का गान करने के बजाय , संत डम डम डिगा डिगा गाने लगे । भारत की वनवासी , गिरिवासी बस्तियों में जाकर कथा सुनाने के बजाए दुबई , न्यूयार्क और लन्दन में ज्ञान बांटने लगे ।

परिणाम सामने है । तीर्थ नगरों की किसी भी अदालत में चले जाइये , वकीलों के बस्तों पर मोटी मोटी फाइलें लिए बैठे साधु संत नजर आ जाएंगे । कहीं कोई पंखे से लटक रहा होगा , कोई अखाड़े के खजाना लेकर फरार हो चुका होगा और कोई गुरु की हत्या की पैरवी करने आया होगा । यह अब आम बात है । सच कहें तो शायद कलिकाल का प्रभाव है । भगवा संस्कृति के मायने ही बदल गए हैं । सप्त ऋषियों के ये ज्ञान मंदिर आज दौलत के खजानों में परिवर्तित हो चुके हैं । तो जो हो रहा है , होने दीजिए । अभी बहुत कुछ देखने को तैयार रहिये , शायद नियति भी यही चाहती है ।