दायरों में बंधा नारी जीवन

लड़खड़ाये जब भी तुम,

मैं तुम्हारा सम्बल बनी।

पर तुम्हारे ही बनाये नियमों

पर सदा चलती रही।

भूल गयी अपने वज़ूद को,

तुम्हारी खुशी को मैं

अपनी हँसी समझती रही।

थोपे तुमने अपने विचार,

मैं स्थावर हाँ कहती रही।

संस्कारों का वास्ता दिया

कभी पिता कभी पति ने,

मैं अपने सपनों को

सदा कुचलती रही।

कभी चाहा जब बोलना,

तब संस्कारहीन कहलायी।

मैं पढ़ लिखकर भी

 'बेवकूफ'ही कहलायी।

बस थोड़ी सी अपनी तलाश थी,

तुमसे सराहना की थोड़ी आस थी,

पर कदम कदम पर 

उपेक्षा सहती आयी।

सुनो!दायरों में बंधा ये जीवन 

अब उड़ना चाहता है,

प्रेम भरी अनुभूति को 

पाना चाहता है।

यूँ तो कुछ कमी नहीं,

पर सोचूं तो मेरा कुछ भी नहीं।

नहीं चाहती अकूत दौलत,

बस अपनी अस्तित्व को

बचाना चाहता है।

खुलकर जीना है मुझे,

दायरों से निकलना चाहता है।


रीमा सिन्हा

लखनऊ-उत्तर प्रदेश