"आख़िर कब तक"

जब सशक्त महिला, सशक्त समाज' देश के विकास में दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं तो महिलाओं को कमतर आंक कर हंमेशा ही प्रताड़ित करना कहाँ का न्याय है। देश में महिलाओं का सशक्तिकरण होना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। महिला सशक्तिकरण यानी महिलाओं की आध्यात्मिक, राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक शक्ति में वृद्धि होना। भारत में महिलाएं शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला व संस्कृति, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान व प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में भागीदारी करती हैं।

भारत का संविधान सभी भारतीय महिलाओं की समानता की गारंटी देता है। राज्य द्वारा किसी के साथ लैंगिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता। सभी को अवसरों की समानता प्राप्त है। समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान है। पर ये सब सिर्फ़ कहने सुनने भर की बात है। कुछ महिलाओं के लिए आज भी कुछ नहीं बदला।

सदियों से जैसे एक परंपरा चली आ रही है, हर सामाजिक मुद्दों में महिलाओं के हिस्से अक्सर अन्याय ही आया है।

जब भी किसी देश ने युद्ध का आलाप छेड़ा, जब भी किसी देश ने बंटवारे का ज़ख़्म झेला, जब भी धर्मांधता की मशाल जली, जब भी दंगे भड़के, जब भी आतंकियों का सत्ता पर कब्जा हुआ इसका सीधा असर, पीड़ा, जुल्म, दैहिक शोषण , हत्या, बलात्कार सब कुछ औरतों के हिस्से आया। सब कुछ औरतों ने झेला। हर बार जवान बच्चियों और औरतों के लिए ऐसा दौर अभिशाप बन कर आया है। यह धरा नर्क बन गई महिलाओं के लिए।

चाहे हिटलर का राज हो, मुसोलिनी का हो या महमूद गजनी की घुसपैठ हो या 21वीं सदी का समाज हर युग में  इंसानियत शर्मसार हुई है। औरतों की दशा से दिल कांप उठता है। औरत सिर्फ़ औरत है चाहे किसी भी जाति, धर्म की हो उसकी देह और भावना से खिलवाड़ ही होता आया है। अफ़घानिस्तान में जो हुआ वह सीधा प्रमाण है इस बात का।

कब थमेगा ऐसा दौर, कब एक स्त्री मान सम्मान के दौर से गुजरेगी, कब उसे वस्तु ना मानकर इंसान समझा जाएगा।

द्रवित, लज्जित और बवंड़र भरे मन से महिलाएं मुँह से ज़हर उगल कर श्राप भले ना देती हो पर भीतर जलती भड़भड़ती आग एक दिन उन अन्याय कर्ता से हिसाब जरूर लेगी।

पर दु:ख इस बात का है की आख़िर कब तक स्त्री विमर्श से साहित्य सजता रहेगा। कब हर औरत आज़ादी की साँसें लेंगी और कब ऐसी कविताओं और लेखों का अग्निसंस्कार होगा। ऐसा महसूस नहीं होता की ये मुद्दा समाज का कलंक बन चुका है। हर तीसरी पोस्ट स्त्री विमर्श में सजी मिलती है इसका मतलब भले हम खुद को 21वीं सदी के खुले खयालात वाले समझते है, पर आज भी कहीं न कहीं औरतें दमन का शिकार होती रहती है। तभी हर लेखक को इस मुद्दे को बार बार लिखने की जहमत उठानी पड़ती है।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु) #भावु