उपभोक्ता पड़े हुए हैं

उपभोक्ता पड़े हुए हैं। सुनने में अच्छा नहीं लगता है। मैंने अपनी नौकरी में रहते हुये इस तरह के शब्दों को कभी नहीं सुना।शायद आप लोगों में से अधिकांश लोगों नें इस तरह की बात कभी नहीं सुनी होगी और आपके दिमाग में भी नहीं आयी होगी। बरसों की नौकरी और स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के बाद कुछ सेवा निवृत्त तो कुछ कामकाजी सहेलियों नें सप्ताह के मध्य में ही मिलने का प्रोग्राम बनाने के लिए आपस में विचार विमर्श करना शुरू कर दिया। आपस में बातचीत के अंश कुछ इस प्रकार हैं। शुक्रवार को बाहर लंच करना है। किसी का उपवास तो नहीं है। ड्रेस कोड बेबी पिंक रहेगा सभी अपने आप को बेबी (बच्ची) ही समझें जो नौकरी में हैं उन्हें समझाने की जरूरत नहीं वह तो बेबी ही महसूस करती हैं अपने आप को और जो सेवानिवृत हैं वह अपने आप को बुड्ढी ना समझें बल्की बेबी पिंक कलर पहनकर अपने आप को बच्ची ही समझें। और हां आखिरी बात सभी लोग समय निकाल कर आ सकते हैं ना। जो नहीं आ सकते हैं वह पहले  ही मना कर दें। अब पार्टी में आने और ना आने वालियों के हां और ना करने के सिलसिले शुरू हो गये। हां करने वालों की लिस्ट अलग तैयार हो रही थी वहीं ना करने वालों की लिस्ट अलग।कुछ ऐसी भी महिलायें थीं जो ना हां कर रहीं थीं और ना ना कर रहीं थी।उसमें से एक महिला नें कहा कैसे चलें पार्टी में मेरी टेबल पर ढ़ेर सारे उपभोक्ता फाइलों में पड़े हुए हैं।जो अपनी बारी की प्रतिक्षा कर रहें हैं। आप लोगों नें तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली अब आप बेबी पिंक पहनों या हॉट रेड पहनों आप लोगों की वजह से काम करने वालों की जो कमी हुई है उसका खामियाजा हम जैसे लोगों को उठाना पड़ रहा है। कभी उपभोक्ता हमारे सर पर खड़ा रहता है तो कभी फाईल के रुप में हमारी टेबलों पर पड़ा रहता है। यह गुस्सा दो तरफा था एक तरफ तो उनसे नाराजगी थी जो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुकीं थीं। दूसरी तरफ काम का बोझ अधिक हो जाने के कारण विभाग से नाराजगी। वर्षों की नौकरी के दौरान यह बात बहुत अच्छी तरह से समझ में आयी की उपभोक्ता हैं तो हम हैं। जब हम नौकरी करते हैं तब जो भी व्यक्ति हमारे विभाग की सेवायें लेता है वह हमारा उपभोक्ता है और जब हम कहीं जाकर सेवायें लेते हैं तब हम उसके उपभोक्ता हैं। आज हर कोई किसी ना किसी रूप में उपभोक्ता है।एक उपभोक्ता होने के नाते दूसरे उपभोक्ता का सम्मान सामने ही नहीं पीठ पीछे करना भी आवश्यक है। चूंकि महिलायें पार्टी का मन तो बना ही चुकीं थीं और सभी सहेलियों का होना भी जरूरी था।क्यों कि फलानी दोस्त के बिना फलाने खाने का या फलाने जोक का मजा कहां आना है। इसलिये इस विचार विमर्श के पश्चात् यह तय हुआ कि नाराज साथियों को समझा बुझा कर और मना कर बेबी पिंक ड्रेस कोड में आने के लिये प्रोत्साहित करा जाये। और जो बेबी पिंक में ना मानें उन्हें हॉट रेड में आने की अनुमति दी जानी चाहिये। अब तक हां वाली लिस्ट पूर्ण हो चुकी थी। और अब लंच टेबल पर बेबी पिंक और हॉट रेड ड्रेस वालियाँ जमकर एक दूसरे की तारीफों के पुल बांध रहीं थी।कोई कह रही थी तुम्हारी त्वचा से तुम्हारी उम्र का पता ही नहीं चलता है। तो किसी नें कहा बेबी पिंक में तो तुम प्राइमरी स्कूल की बच्ची लग रही हो।वहीं कुछ-कुछ हॉट रेड ड्रेस वालीयों को रेड रोज,जानेमाने आज तो बिजली गिरा रही हो, वॉव, रेड में कातिल हसीना लग रही हो ।पापा की रेड और पिंक परियां अपनी अधेड़अवस्था और बुढ़ापा भूल कुछ अपने आप को बच्ची तो कुछ नवयौवना समझने लगीं थीं। बहुत सारी परियों नें अपने ऑफिस के शुरुआती दिनों को अपना बचपना मान कर याद करा। इसके साथ ही बहुत देर हो चुकी थी बातें करते-करते तो अब सभी को लगने लगा कि सभी को खाना खाने के पश्चात् अपने गंतव्य पर भी जाना है। होटल वाला खाना लाने में देर कर रहा था और सभी बेबी पिंक और हॉट रेड महिलायें उपभोक्ता के रूप में कुर्सियों पर जमीं (पड़ी)हुईं थीं। 

उपभोक्ता पड़ा हुआ नहीं है। वह है तो हम हैं।हमारा संपूर्ण वजूद ही उपभोक्ता पर निर्भर है। उपभोक्ता आता है तो पैसा आता है। और पैसा हर दौर में नम्बर वन भगवान है यह अतिश्योक्ति की बात नहीं है।।बच्चों की शिक्षा, शादी और मकान बनाने जैसी बुनियादी चीजें उपभोक्ता पर ही निर्भर करती हैं।इसलिये यह कभी ना कहें की उपभोक्ता पड़ा हुआ है। इसकी जगह यह कहा जा सकता है कि टेबल पर उपभोक्ता इंतजार कर रहें हैं। या वह अपनी बारी की प्रतिक्षा कर रहे हैं।

रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

ramamedia15@gmail.com