बहाव रिश्तों का

रिश्ते नाजुक बड़े ही होते हैं किंतु कोमल नहीं होते।कभी कभी रिश्ते दर्द बन के रह जाते हैं तो तकलीफदेह बन जाते हैं।रिश्ते जब अपने हिसाब से ही चलते हैं तो काफी सरल लगते हैं,सड़क पर चलती गाड़ी की तरह,पूरपाट दौड़ने लगते हैं।लेकिन जब जरा सा भी बदलाव आ जाएं तो पगदंडी बन के रह जाते हैं जहां चलना पड़ता हैं संभल संभल के।मिलते जुलते रह ने से रिश्ते निभ तो जाते हैं लेकिन कब कैसे और क्यों उसकी गति में दोहराव आ जाता हैं वो समझ से बाहर की बात हैं।तभी साधु संत जो ईश्वर को पाना चाहते हैं वो रिश्तों से परे रहते हैं,ये रिश्ते जी के जंजाल कब बन जाते हैं वह तब समझ में आता हैं, जब बात काफी दूर तक पहुंच जाती हैं।क्या कारण होता हैं रिश्तों की कड़वाहट का,एक तो कोई तीसरा व्यक्ति आके उसमें अपनी महत्ता बढ़ाने के लिए सरल रिश्तों में ग्रंथियां पैदा कर देते हैं,गांठे डाल ने की कोशिश करने से रिश्तों की उम्र कम हो जाती हैं। रिश्तों में मुटाव से एक ही व्यक्ति को नुकसान नहीं होता सभी पक्षों को होता हैं। सामूहिक परिणाम होते हैं,फिर चाहे मन मानने के लिए बोल सकते हैं ’ मुझे क्या’,लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता,जो बोलता हैं मुझे क्या वही सब से ज्यादा प्रभावित होता हैं,’मुझे’ क्या की अभिव्यक्ति सिर्फ मन मनाने की बात होती हैं।कोई बोलता हैं रिश्तों को बढ़ाओं मत पर ये एक व्यक्ति पर आधारित नहीं होता हैं,रिश्ते सामूहिक प्रक्रिया हैं तो उसमे जिम्मेवारियां भी सामूहिक और परिणाम भी सामूहिक होता हैं।

 एक लय होती हैं हरेक रिश्तें में और उसी लय में निभाना जरूरी होता हैं, समभाव और संयम से ही एक आविर्भाव पैदा होता हैं और उसी आविर्भाव से घनिष्ठता बढ़ती हैं।एकाकार सा छा जाता हैं ,जो रिश्तों को अमर सा बना देता हैं।ये अमरत्व भौतिक नहीं भावनात्मक होता हैं।इसी लिए रिश्ते और उसकी पहचान बहुत जरूरी हैं।

 किसी एक के क्षणिक लाभ या उद्वेग की वजह ही बन जाती हैं रिश्तों में गांठ,और फिर आती हैं हमदर्दी बटोर ने की घड़ी,अपनी त्रुटि को छुपाने के लिए कई हथकंडे अपनाए जाते हैं,जो कलह या मनदुःख कारण बन एक ऐश्वरीय बंधन जो दोस्ती हो या रिश्ता उसे ग्रस जाता हैं।

 अगर रिश्तें नसीब से बनते हैं तो बिगड़ ने को बदनसीब ही कहा जायेगा। जिस किसीने भी रिश्ते निभाए हैं वह दिल के अच्छे और दिमाग से जागृत होते हैं,कदर जो जाने रिश्तों की वही मान और सम्मान पाते हैं।सामने चाहें कोई हजार तारीफें करले किंतु नजर में सम्मान होना मुश्किल हो जाता हैं।जो रिश्ते में सम्मान नहीं होता वह सतही बन कर रह जाता हैं,गहराई को खो देता हैं।एक सहजता भी चली जाती हैं ,जो रिश्तों का अति आवश्यक घटक हैं।

 रिश्तों का बहाव सिर्फ समतल धरा पर ही नहीं होता ,उतार चढ़ाव भी आते हैं और यही उतार चढ़ाव परीक्षा की घड़ी हैं।आप उसे कैसे समझते हैं,उसका हल कैसे लाते हैं और उसका प्रतिघात क्या,और कैसा होगा ये सभी संभावनाएं रहती हैं।जो एक बहाव हैं रिश्तों में उसी की लय में चलके ही रिश्ता निभाना ही एक सही रास्ता हैं, न ही खुद को ज्यादा काबिल समझो और न ही किसी को कम।

एक दूजे से जुड़ कर बनना  पड़ता हैं हम।


जयश्री बिरमी

अहमदाबाद