सच सोचा था बनूंगी कवयित्री

कुछ इस कदर महका दो

कलम की कस्तूरी से अपने

जज़्बातों इन कागज़ी पटल पर


हर तरफ उठी चली आए 

वाह वाही जज़्बातों के ही

दम़ पर।।


कोई दर्द तो कोई खुशी 

झलकादो रोज मिली हुई 

जिंदगी के हर कदम पर।।


सच भूल जाओगे

खुद को, खो जाओगे खुद मे।।

सच पाओगे खुद को तुम वहां

जो सोचा ना था बनूंगी कवयित्री 

मैं कभी अपने कर्म पर।।


वीना आडवानी तन्वी

नागपुर, महाराष्ट्र