संस्कृत के भक्त

घर वालों के लिए रविवार का दिन था और मेरे लिए वेबिनार का। सुबह से लेकर शाम तक किसी न किसी वेबिनार में उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती थी। नहीं तो लोग हमें लुप्तप्राय समझते। आजकल अपने लिए कम दूसरों के लिए ज्यादा ढोंग करना पड़ता है। ऐसे ही किसी एक वेबिनार में भाषा की शुद्धता को लेकर गरमागरम बहस चल रही थी। बोलने वाले बोल रहे थे। चिल्लाने वाले चिल्ला रहे थे। हम न तो बोलने वालों में से थे और न चिल्लाने वालों में। हम तो इन दोनों के बीच चुटकी लेने वालों में से थे। कभी एजी, ओजी करके तो कभी एमोजी भिजाकर अपनी चुहल का कीड़ा शांत कर लेते थे। कहने वाले तो एजी, ओजी और एमोजी करने वालों को भी महान कलाकार मानते हैं।

हमने देखा कि चैट बॉक्स में हमारी टिप्पणी जिसमें लिखा था, आदरणीय मैं समझता हूँ कि भाषा का स्वभाव सज्जन की तरह होना चाहिए। उसमें दूसरों को अपनाने का जितना बढ़िया गुण होगा, वह उतना स्वीकृत होगा। मान्य होगा और आदर पाएगा। अन्यथा किसी दिन यह पढ़ाना पड़ेगा कि भारत के किस गाँव के सभी लोग संस्कृत में बात करते हैं? इस पर हमारा एनकाउंटर करने के लिए सामने वाले ने लिख डाला, संस्कृत भाषा से ज्यादा विनम्र और समावेशी विकास कहीं अन्यत्र नहीं है। हमें लगा कि यह तो कानपुर के लिए नागपुर का जवाब दे रहे हैं। यह बिन सिर-पैर का जवाब यहीं तक होता तो कुछ बात होती। एक अन्य ने लिखा, संस्कृत तो एक वैज्ञानिक भाषा है और यह मानव विकास की मूल भाषा रही है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इसे देवों की भाषा कहा जाता है। संस्कृत का पठन और पाठन दोनों ही गर्व का विषय है। भोपाल में संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना राजधानी के गौरव को बढ़ाती है।

इस पर हमने लिखा, आदरणीय आपकी बात से हम पूर्णतः सहमत हैं। भोपाल में ही क्यों हमारे यहाँ भी (तेलंगाणा भर में) संस्कृत का बड़ा मान-सम्मान होता है। हमारे यहाँ छात्र पहली कक्षा से दसवीं कक्षा तक तेलुगु, अंग्रेजी पढ़ते हैं। छठी से हिंदी भी पढ़ते हैं। नहीं पढ़ते हैं तो वह है, संस्कृत। दूर-दूर तक संस्कृत की घांस का नामोनिशान तक नहीं मिलता। किंतु इंटर में आते ही रातों-रात उनमें संस्कृत का घना जंगल उग आता है। और उनके लिए परीक्षाओं में 99-100 अंक (100 अंकों में ) से कम पाना नागवार गुजरता है। यही कारण है संस्कृत का परिणाम 95 से 99 प्रतिशत निकलता है। आश्चर्य की बात यह है कि माँ की कोख से लेकर दसवीं कक्षा तक तेलुगु के आदी हो चुके छात्रों का अपनी ही मातृभाषा में 70 प्रतिशत से अधिक उत्तीर्णता नहीं दिखाई देती। इस हिसाब से यहाँ भी संस्कृत का मान सम्मान बहुत होता है.....किंतु छात्र संस्कृत की परीक्षा......संस्कृत में नहीं तेलुगु या अंग्रेजी में लिखते हैं। उसके बाद संस्कृत के पक्षधरों ने हमें गरियाकर समूह से हटा दिया।


डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, चरवाणीः 7386578657