मुश्किल न था मंजिलें पाना,,,,,,

लोग तुझको देख लेते  हैं,

और मुझ पे तंज़ करते हैं,

ज़ख़्म मुस्कुराते हैं  ये मेरे,

और कांटो पे तंज़ करते हैं,

उनके करम का मैं तालिब ,

मेरे एहसास तंज़ करते हैं,

दिल की दुनियां उजड़ गई,

तेरे अल्फ़ाज़  तंज़ करते हैं,

मुश्किल न था मंजिलें पाना,

तेरे वादे मुझ पे तंज़ करते हैं,

काश फितरत तेरी अयाँ होती,

पल माज़ी के तंज़ करते हैं,

सावन की आमद का पता है ,

मुश्ताक़ ,दोस्त तंज़ करते हैं,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,,,,

सहज़ हरदा,,,,,,,,,,,,,

मध्यप्रदेश,,,,,,,,,,,,,,