नारी हां मै एक नारी हूँ



कभी चलती हूँ ,

कभी ठहरती हूँ,
 कभी मुस्कराती हूँ, 
कभी बिखर जाती हूँ, 
क्या है मेरी जिन्दगी,
मुझे पता नहीं जब बढ़ती हूँ,
तो अचानक रोक दी जाती हूँ,
हर एक के रंग में रंगती हूँ,
हर एक के साथ ढलती हूँ,
फिर भी एक और ,
कहानी बनाई जाती हूँ ,
कठपुतली की तरह नचाई जाती हूँ ,
उम्र के इस पडा़व पर आकर भी,
क्या मुझको जीने का अधिकार नहीं, 
सारी उम्र दबाती रही भावनाओं को,
नहीं थी वाह वाह सुनने की उत्सुकता,
बस रहती है एक आशा,
कोई तो आकर बैठे सुने मेरी दास्तां ,
दोहराना चाहती हूँ वह कथायें,
जो बीती हैं उसके साथ,
बैठी रहती हूँ सूनी आंखो में,
कुछ झिलमिलाती अश्रु बूंदो को लेकर,
सुनती रहती हूँ उन आहटो को ,
शायद कोई उनको आकर भी पढ़े
मेरे मन की अभिलाषा 
 
डा. मधु आंधीवाल
अलीगढ़