त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति, कुतो मनुष्य:।।

त्रिया चरित्रं, पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति, कुतो मनुष्य:।।

अर्थात, जब स्त्री का स्वभाव और पुरुषों के भाग्य के बारे में देवता नहीं जान पाए तो मनुष्य क्या चीज है।

मर्द तो ख़ामखाँ बदनाम है, आज हर तीसरी पोस्ट पर स्त्री विमर्श और स्त्रियों के हक में ही लिखा जाता है। स्त्री सम्मान की भावना को लेकर पुरुष को जानें कितनी बातें सुनाई जाती है। मर्द स्त्री का सम्मान करें न करें ये दूसरी बात है, पर सोचने वाली बात यह है कि क्या माँ, बहन, बेटी, सास, बहेन सबके मन में खुद परस्पर एक दूसरे के लिए सम्मान की भावना होती है? क्या एक स्त्री दूसरी स्त्री का सम्मान करना जानती है। 

राग, द्वेष, इर्ष्या ग्रस्त मन जितना स्त्री का है उतना पुरुष का नहीं। यहां तक कि दो जिगरजान कहलाने वाली दो सखियों के मन में भी कहीं न कहीं एक दूसरे के लिए इर्ष्या भाव पनपता रहता है। ऐसे में सास-बहू, देवरानी-जेठानी या ननद-भाभी के बीच सामंजस्य की आशा रखना गलत है। 

भले हर औरत ऐसी नहीं होती पर अधिकतर महिलाएं ऐसी ही होती है। माँएं बेटी को हर तरह के संस्कार देगी, हर काम सिखाएगी पर बेटी को ये सीखाया नहीं जाता कि अपनी सास को माँ समझना, जेठानी को बड़ी बहन और ननद को सहेली समझना। इससे विपरित ससुराल को कालापानी की सज़ा बताकर अपनी बेटी को यही सिखाया जाता है कि सास से दबना नहीं, सारा काम अकेले मत ढ़ोना, जेठानी का हुकूम बिलकुल मत मानना और ननद के नखरें तो बिलकुल मत उठाना।

नांहि सास अपनी बहू को बेटी समझने की शुरुआत करती है। बहू कामकाजी है तो कितनी सास ऑफ़िस से थकी-हारी लौटी बहू को चाय पिलाती है, या गर्म रोटी बनाकर परोसती है? या कौनसी जेठानी देवरानी को छोटी बहन समझकर हर काम में हाथ बटाती है, नांहि ननद भाभी को वो सम्मान देती है। बहुत ही कम स्त्रियों में ये समझ होती है। और औरतों की यही कमी परिवार को बांटने का काम करती है। 

कहा तो जाता है कि महिलाओं में क्षमा, दया जैसे प्राकृतिक गुण होते हैं, लेकिन आजमा कर देखिए उनकी यह दरियादिली की बारिश में भीगने का अवसर पुरुषों को ही ज्यादा मिलता है। जब लड़की ब्याह कर जाती हैं तो ससुर, देवर और नन्दोई उनके लिए किसी देवता से कम नहीं होते, लेकिन बेचारी सास या ननद साक्षात विलेन का ही स्वरूप होती है। वे हर किसीको आसानी से माफ कर देती हैं, लेकिन सास को? इस पर तो शायद कोई लड़की सोचना ही पसंद नहीं करती।

कहीं भी देख लीजिये महिला को महिला के विरुद्ध ही पाएँगे। फिर वह चाहे शिक्षित हो, या निरक्षर। सदियों से यही चला आ रहा है और सदियों तक चलता रहेगा। बस एक बार सास बहू में बेटी का रुप देखें और बहू सास में माँ का रुप कसम से "स्त्री ही स्त्री की दुश्मन" कथन का साहित्य के हर पन्नों से विसर्जन हो जाएगा।

पर गोसिप में माहिर स्त्रियाँ एक मौका नहीं छोड़ती अपने आस-पास बसी औरतों को नीचा दिखाने का। अक्सर किटी पार्टियों में एक स्त्री दूसरी स्त्री को नीचा दिखाने का काम ही करती है। स्टेटस से लेकर पहनावा, पसंद और रहन-सहन पर टिप्पणी करते खुद को सुंदर, सक्षम और समझदार दिखाने की स्त्रियों में होड़ लगी रहती है। मोहल्ले में  किसकी बेटी कहाँ जाती है, किससे मिलती है से लेकर पडोसी की शादीशुदा बेटी 15 दिन मायके में रहे तो स्त्री ही बातें बनाने में उस्ताद होती है।

मर्द इस तरह की हरकतें बहुत कम करते होंगे। परिवार की नींव होती है स्त्रियां। हर माँ का फ़र्ज़ है अपनी बेटी को ये सीखाना की तुम्हारे जीवन में आनेवाली हर स्त्री का सम्मान करना। जब तुम सामने वाले को मान दोगी, अच्छा व्यवहार रखोगी तभी तुम्हें सम्मान मिलेगा। पहले हर स्त्री को एक दूसरे को समझने की जरूरत है, एक दूसरे को मान देते साथ और सहारा देने की जरूरत है। चाहे दोस्ती हो, परिवार हो या समाज स्त्री जब दूसरी स्त्री का सम्मान करना सीख जाएगी तब विभक्त परिवार एक होंगे, अखंड परिवार की शुरुआत होगी अपनेपन और शांति सभर समाज का गठन होगा।

सिर्फ़ मर्दों से ये आशा न रखें की मर्द हर औरत का सम्मान करें स्त्रियों से भी ये अपेक्षा रखी जाएँ। हर बेटी को बचपन से ही ये सिखाया जाए तभी सदियों से चली आ रही परंपराएं टूटेगी। सास बहू के संबंध माँ बेटी जैसे बनेंगे और इर्ष्या भाव का शमन होते ही समाज संस्कारवान दिखेगा।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु) #भावु