दहेज

सभ्यता,संस्कृति और संस्कारों की,

धरोहर वाले देश में,ना जाने क्यों ये कुप्रथा,

चली आ रही दहेज के भेष में।


बेटियों को कहीं ज़िंदा जलाया जा रहा,

कहीं फंदे पर लटकाया जा रहा,

दहेज की आड़ में,हर संताप 

से जुझाया जा रहा।


ग़रीब बेटी के जन्म से डरते हैं,

दहेज के पैसे जुटाने की खातिर,

मकान तक गिरवी रखते हैं।


यह भी मुख्य वजह है भ्रूणहत्या की,

दहेज लोलुपों के भय से ,

गर्भ में ही कन्या को मिटाने की।


पुरुष प्रधान इस देश में नारे लगते,

'बेटी बचाओ  और बेटी पढ़ाओ'के,

पर अन्तःतम ना मिट पाता

दहेज के ठेकेदारों के।


प्रतिभापूर्ण बेटियां चढ़ जाती दहेज की शूली पर,

बहुत दारुण्य होता है वो दृश्य जब ,

पिता रखते शीश लड़के वालों के पग पर।


हृदयभेदित शूल लिये बेटियाँ विदा हो जाती हैं,

ससुराल के ताने को सह सहकर ,

मुखर बेटियां भी मौन हो जाती हैं।


सदियों से चली आ रही ये कुप्रथा

समाप्त होनी चाहिये,

जननी हैं बेटियां इस जगत की,

उन्हें समानता का अधिकार होना चाहिये।


धरारक्षिणी को ससम्मान जब

बिना दहेज तुम घर लाओगे,

खिल उठेगी तब वसुंधरा,

मात लक्ष्मी को सदा प्रसन्न पाओगे।

                 रीमा सिन्हा(लखनऊ)