आने वाला कल

आने वाला कल कैसा होगा?

सोच कर सिहर जाती हूं।

मेरी कलम भी परेशा रहती है,

अक्सर मुझसे यही कहती है।

बेधड़क लिख दो कि....

आने वाला कल कैसा होगा?


न घर बचेगा,न वन बचेगा,

न अन्न बचेगा,न जल बचेगा।

न तन ढकने को वस्त्र होगा,

जहरीली हवाओं का बसेरा होगा।

नभ से झर-झर अंगार बरसेगा,

वेकल मन सड़कों पर बेचैन पड़ा होगा।


हे मनुज तोड़ दो मिथ्याभिमान,

अभी भी वक्त है संभल जाओ।

झूठा साबित कर दो जो कहते हैं,

आने वाला कल ऐसा होगा।

चलो लौट चलें वेदों की ओर,

रंग दे धरा को धानी रंग से।

बचा ले प्रकृति और बेजुबानों को,

बचा ले यह जीवन है जो अनमोल।


कलयुग काला है तोड़ दो इस भ्रम को,

चलो सत्कर्मों से कलयुग में,

काला नही हरा रंग भर दे।

उठाओ तुलिका वसुंधरा को फिर से रंगीन कर दो,

फिर से सर-सर मधुर पवन बहे,

मेघ झम-झम बरसात करें।

उदास कलम पुलकित हो जाए,

आने वाला कल खुशियों से भर जाए।


प्रियंका पांडेय त्रिपाठी