पितृमोक्ष

नन्ही अंजली से  कुश तिल और जल तर्पण का हृदय टीस बन देता दर्द।

अबोध बालक के  पितृ तर्पण का  हृदय विदारक देता दर्द।।


हे पिता उपकार तुम्हारे मूर्त रूप करने  को तैयार।

इस नन्ही हाथों में सामर्थ कहाँ    कैसे उतारें आपका उपकार??


क्या तिल जल और मुखाग्नि तक का था बस  आपका हमारा साथ।

मेरे छोटे पॉव जमीन पर ठीक से टिके भी तो नहीं थे अपने आप।।


चलना भी तो नहीं सीखा है छोड़ गए इस बीच मजधार।

अनुभव हीन और अनभिज्ञ हूँ कैसे करूँ ये भव सागर पार ।।


इस जीवन के उतार चढ़ाव में  होगा कौन सहायक मात्र ?

अनाथ और बेसाहारा मैं  किससे जाकर करूँ गुहार ??


क्षत्र पिता का सर से गायब विकल खड़ा अब मैं अबोध।

किसकी उँगली किसकी गोदी जाकर बैठु मैं अबोध ??


क्या जल्दी थी परलोक गमन को क्या गहरा है राज बड़ा?

मुझे क्या करना इन राजों से मेरे साथ हुआ अन्याय बड़ा।।


सुनते हैं एक जगत पिता हैं जिसके बस में है पूरा संसार।

क्या उनको भी दया नहीं इस अबोध से छीना कैसे पिता का साथ??


अब तो बस ये नन्ही अंजली  और ये सिमटा संसार ।

आंखों में बस अश्रु बून्द और पितृमोक्ष की आशा मात्र ।।


पर अंदर में ह्रदय हिंडोले मन  विह्वल और भरा सन्ताप।

पिता मिलन की आशा मन में फिर भी कर रहा आपका श्राद्ध।।


श्री कमलेश झा भागलपुर