जागरण

भव सिंधु के मोह पैमाने,

उनको मैंने तोड़ दिया ।


भ्रम की बहुत बड़ी थी गठरी,

 बीच राह में छोड़ दिया। 


तब जाकर मेरी आंखों से,

विराट यह संसार दिखा।


अपना पराया कोई नहीं, 

मानवता ही प्यार दिखा।


यह पग चलने को आतुर,

मानवता का गांव दिखा। 


जब बधा जीवन से आत्म बल, 

घनी धूप में छांव दिखा। 


दोष नहीं दो यहां किसी को,

जन को ना परमेश्वर को। 


तुम ही तम निद्रा में खोए हो,

न जान सके निज ईश्वर को।


दया सिंधु करुणा का रूप,

तुझ पर प्रेम लुटाता है।


पर इस क्षण भंगुर जीवन का,

मोह मुक्ति कब पाता है 

मोह मुक्ति कब पाता है।।


अंजनी द्विवेदी,(काव्या)

देवरिया उत्तर प्रदेश