"कड़ी मेहनत का बदला मिलता जरूर है"


अगर हौसला बुलंद हो तो हालात जरूर बदलते है और इस बात का बेनमून उदाहरण है जन्म से दिव्यांग सुहास एलवाय। आजकल के युवाओं के लिए प्रेरणादायक कह सकते है सुहास एलवाय का संघर्षरत सफ़र। सुहास के जीवन की कहानी संघर्षों से भरी रही है। बचपन में सामान्य बच्चों के बराबर रहने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। जब बड़े हुए तो नौकरी में संघर्ष रहा। जब नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी के लिए सोचा तब तो संघर्ष भी अपनी सीमा पार कर गया। दरअसल, उसी दौरान उनके पिता का निधन हो गया और परिवार की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी। उन्होंने दोनों को जिम्मेदारियों को पूरी हिम्मत के साथ निभाया।

पिता के देहांत के बाद सुहास ने यूपीएससी के लिए अपनी मेहनत को और तेज कर दिया। घर का अकेला कमाने वाला शख्स, नौकरी के साथ-साथ समय निकालकर परीक्षा की तैयारी भी कर रहा था। दिन में वो नौकरी करते थे और रात में पढ़ाई। हाल ही में पैराओलंपिक खेलों में बैंडमिंटन में रजत पदक जीतकर लौटे सुहास की चर्चा पूरे देश में हुई। दरअसल वो देश में संभवत: ऐसे पहले ब्यूरोक्रेट हैं जो ओलंपिक में पदक जीत चुके हैं। हाल ही में बीबीसी हिंदी को दिए एक इंटरव्यू में सुहास एलवाय ने अपने जीवन और खेल के बारे में विस्तार से बताया था।
कर्नाटक के शिमोगा में जन्में सुहास की प्रारंभिक पढ़ाई मातृभाषा कन्नड़ में हुई। इसकी वजह से उन्हें अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में दाखिले में काफी दिक्कतें आईं। तीन स्कूलों ने उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया था। उनके परिवार ने कभी भी उन्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि वो बाकी बच्चों से अलग है। पैर से दिव्यांग होने के बावजूद सुहास के पिता उन्हें खेलने के लिए प्रेरित करते रहे और उसी का नतीजा है कि आज पैराओलंपिक बैंडमिंटन में भारत के पास रजत पदक आया है।
सुहास ने कंप्यूटर साइंस से इन्जीनियरींग की और इसके बाद उन्हें नौकरी मिल गई थी। लेकिन पिता के देहांत के बाद सुहास की दुनिया पूरी तरह से बदल गई। घर की जिम्मेदारी सुहास के कंधों पर आ गई और उसी समय उन्होंने फैसला किया कि वो यूपीएससी की तैयारी करेंगे। उन्होंने नौकरी के साथ इस परीक्षा की तैयारी की। 2007 में उन्होंने यूपीएससी  की परीक्षा में सफलता हासिल कर ली। उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर आवंटित हुआ।
सुहास को बचपन में क्रिकेट पसंद था। उनके परिवार ने उन्हें कभी किसी खेल को खेलने से नहीं रोका। सुहास 2016 में पहली बार पेशेवर बैडमिंटन टूर्नामेंट में शामिल हुए थे। तब उन्होंने बीजिंग में हो रहे एशियाई चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद नंबर आया टोक्यो पैराओलंपिक का, जहां उन्हें सिल्वर मेडल मिला।
सुहास एलवाय की पत्नी भी सिविल सेवा में कार्यरत है। वह असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट हैं और गाजियाबाद में पोस्टेड हैं। सुहास एलवाय के हौसलों को सलाम करते इतना ही कह सकते है की दुनिया में कुछ भी नामुमकिन नहीं पाने की ज़िद्द हो तो ज़िंदगी को देना ही पड़ा है।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)