है नेह नही बस तुमसे


है प्रीत नही बस तुमसे
ये राग तुम्ही से है
आवाज तुम्ही से है
है सिन्चित हर राग तुम्ही से 
रंग और अभिमान  तुम्ही से 
संतृप्त आत्मा तुम ही हो
जन मन का गान तुम ही हो
व्याकुल मन का उद्गार तुम्ही
नवजीवन का संचार तुम्ही
वसुधा का श्रृंगार तुम्ही 
पुष्पित पल्लव मधुमास तुम्ही
 देवमयी है रुप उजागर 
छन्द लय सुर ताल सुशोभित 
निज भाषा का गौरव बनकर 
शीश मुकुट हिन्दुस्तान तुम्ही
अन्तरवेदना  पी लेती तुम 
सुख दुख का रूप सजोती तुम
शब्द रूप मे साथी बनकर 
अन्तसतम हर लेती तुम
सुमधुर सरस्वती की माया 
देवी सा देती जो छाया
 है अद्भुत तेरा प्रकाश पुंज 
जीवन- अमृत भर देती तुम।

वंदना श्रीवास्तव,वरिष्ठ गीतकार
कवयित्री व शिक्षिका स्वतन्त्र 
लेखिका व स्तम्भकार, जौनपुर-
उत्तर प्रदेश